समयाभाव में हम कुछ पुराने से दिखते स्मारकों को राह चलते नज़रों में कैद करते हुए आगे बढ़ रहे थे। एक जगह खूबसूरत सी इमारत पर सदर मंज़िल लिखा दिखा। ये सन 1898 ईसवी में बनी इमारत है।इसे नवाब शाहजहां बेग़म ने बनवाया था। जब शाहजहाँ बेग़म दुनिया से रुख़सत हुईं तो सदर मंज़िल की मिल्कियत नवाब सुल्तान जहाँ बेग़म के हाथ आई । वह शाहजहाँ बेग़म की बेटी और इकलौता वारिस थीं। उन्होंने सदर मंज़िल को रियासत के दरबार हाल में बदल दिया।भवन अपने स्वरूप में आज भी भव्य और आकर्षक है।इसमें की गई पच्चीकारी की विशेष चर्चा होती है और उसे लाल किले(दिल्ली) के दीवान-ए-ख़ास की पच्चीकारी जैसा ही शानदार बताया जाता है। बेहतरीन वास्तु वाला यह भवनअपने सम्पूर्ण इतिहास में सक्रिय गतिविधियों का केंद्र रहा।आजकल यहाँ शहर भोपाल की नगर पालिका का दफ्तर है। सन 1953 से इस काम के लिए सदर मंज़िल का इस्तेमाल किया जा रहा है। बेहतर होता कि वास्तु की इस धरोहर को संरक्षित स्मारक का दर्ज़ा दिया जाता और इसकी निगहबानी पुरातत्व विभाग को दे दी जाती।
इसी तरह की बातें गुनते- बुनते हम शहर के साथ अपना परिचय बढ़ा रहे थे। भोपाल अपनी ख़ूबसूरत झीलों के साथ अपनी खूबसूरत मस्जिदों के लिए भी चर्चित है। इस शहर की खूबसूरती जितनी झीलों से नुमाया है उतनी ही मस्जिदों से भी। सदर मंज़िल से गुजरते हुए हम ताज-उल-मस्ज़िद पहुँचे। इस मस्ज़िद के पास हिंदुस्तान की सबसे बड़ी मस्ज़िद होने का तमगा है। इसे बनाने का हौसला नवाब शाहजहाँ बेग़म (1868-1901) ने किया। शाहजहाँ बेग़म इसे अंजाम तक न पहुँचा सकीं। इस मुकद्दस काम को उनकी वारिस बेग़म सुल्तान जहाँ(1901-26) ने आगे बढ़ाया। इसे मसाज़िद कहा गया है। मसाज़िद मस्ज़िद का बहुवचन है। मस्ज़िद के उत्तरी हिस्से में महिलाओं के नमाज़ अदा करने की व्यवस्था है। पश्चिम में इबादतखाना है। मस्ज़िद एक ऊँचे चबूतरे पर खड़ी है। उसके क़रीब तक ले जाने के लिए सीढ़ियों की शृंखला है। तीन गुम्बदों, दो मीनारों से सजीधजी यह मस्ज़िद आकर्षक है।
ऐतिहासिक मस्जिदों में आने-जाने पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं दिखा। हम शान से मसाज़िद में टहलते रहे। धूप जरूर हमारी परेशानी का सबब थी। पत्थर की फ़र्श तप कर पैर जला रही थी। मस्जिद प्रांगण में पानी के तीन जलाशय हैं। एक सूखा था बाक़ी दो का इस्तेमाल नमाज़ी वुजू के लिए और बच्चे खेलने के लिए कर रहे थे। एक बच्चा पतंग उड़ाने में तल्लीन था। धूप से उसका चेहरा तम्बई हो गया था,चेहरे पर पसीना चुहचुहा आया था। बावजूद इसके धूप से उसकी एकाग्रता निरपेक्ष थी। मानो वह किसी साधना में तल्लीन हो। कुछ बच्चे क्रिकेट में मगन थे। एक तरफ़ मदरसा था। अच्छी-खासी चहल-पहल थी। चारो तरफ़ मन भर चल लेने के बाद हम कुछ देर को ठहर कर एक पेड़ के नीचे बैठ गए।
ज्यादातर मस्ज़िद परिसर में क्षेत्रीय लोग ही थे। इक्का दुक्का पर्यटक भी दिख रहे थे। चहल-पहल के बावज़ूद हर कोई ख़ुद में मसरूफ़ था, दूसरे की दुनिया से कटा हुआ, बिल्कुल जुदा। सिर्फ़ जूता स्टैंड से छुटपुट संवाद हवा में तैर रहा था। अचानक एक बच्चा गोद से छूट कई सीढ़ियां लुढ़क गया। कुछ साँसों के अंतराल पर उसकी करुण चीख पूरी मस्ज़िद में गूँज गई। अनायास ही हम उसकी तरफ़ बढ़ गए। रुआंसा,डबडबाई आँखों से वह बेहद कातर नाराजगी से इधर-उधर देख रहा था। उसके ऊपर सीढ़ियों से गुज़र रहे प्रवेश द्वार पर मधु मक्खियों का भारी-भरकम छत्ता था। हर बात से बेख़बर मधु मक्खियां अपने काम में तल्लीन थीं। पूरे परिसर में पतंग उड़ाता बच्चा और काम में लगी मधु मख्खियां इबादत की नई परिभाषा लिख रहे थे। तसमें बाँध हम वापसी के उपक्रम में थे…
भोपाल में खर्च करने के लिए समय की जो जमा पूँजी हमारे पास थी वह जनजातीय संग्रहालय को दखते-देखते चुक गयी। अपनी भी बैटरी रिचार्ज माँग रही थी। शहर की गलियों में गुजिश्ता भोपाल की गमक को महसूस करते हुए हम वापस लौट रहे थे।
गलियों की बनावट,तमाम लोगों का पहनावा,चाल की शायराना लचक लख़नऊ की याद दिला रही थी। सूरज की आँच मद्धम हो कर कुछ वक्त के लिए थम गई थी। बुझने से पहले का ठहराव था। चालक रवि शहर के बारे में कुछ न कुछ बताते हुए गाड़ी चला रहे थे। थके हुए परिवेश में उनकी आवाज़ लय बद्ध संगीत की तरह तैर रही थी।बीच-बीच में ‘राष्ट्रवाद’ से प्रेरित उनके वक्तव्य ऊब भी पैदा कर रहे थे। उम्र कम थी उनकी। सोच परिपक्व ही न हो सकी थी तो परिमार्जित क्या होती।
बहस करने की इच्छा न थी। सो हम उन्हें लगभग अनसुना कर दे रहे थे। वो ‘छोटा पाकिस्तान’ के बारे में बताने में मशगूल थे। इधर हमारे दिमाग में एक ख़ास नाम की कुलबुलाहट थी- ‘सूरमा भोपाली’। याद ही नहीं आ रहा था कि सूरमा भोपाली के बारे में कहाँ पढ़ा था। पढ़ा था या कुछ और मसला है। कौन हैं ये? कब सुना नाम,कोई शायर हैं शायद या कोई फिल्मी किरदार, याद नहीं…
अंततः गूगल से ही समाधान मिला। गूगल दिन पर दिन गब्बर होता जा रहा है और हमारा उस पर आश्रय जब्बर। ख़ैर! अपनी खोज की उपलब्धि से प्रसन्न हम बोट क्लब के पास ठहर गए। सूरज ने विदा के पहले किरणों को पुकार लगाई। बड़े तालाब का पानी सिन्दूरी हो गया। हम भी ठहर कर पानी और किरणों की विदा का मंजर देखने लगे।
आहिस्ता-आहिस्ता सूरज की आँच बुझ गयी। मद्धम पड़ते हुए वह झील के पानी में कहीं खो गया। कलरव करते हुए परिन्दों के साथ हमने भी वापसी की राह पकड़ी।
शोले फ़िल्म की कहानी लिखते समय जावेद साहब ने ‘सूरमा भोपाली’ नाम का एक किरदार गढ़ा। इसमें पर्दे पर जान डाली जगदीप साहब ने। सुनते हैं कि जावेद अख़्तर साहब ने इस किरदार की प्रेरणा ली थी भोपाल के ही सैफिया कॉलेज में पढ़ाई करने वाले असल सूरमा भोपाली नाहर सिंह बघेल से। नाहर सिंह को लोग काले मामा भी कहते थे।
नगर निगम में नाकेदार रहे नाहर सिंह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। गाने के शौकीन नाहर स्वभाव से बेहद झगड़ालू थे। ‘नाक पर गुस्सा, आंखों में सुरमा’ सजाए नाहर को उनके दोस्त मजे-मजे में सूरमा भोपाली कहने लगे। चर्चा ये भी है कि जब फिल्म शोले रिलीज हुई तो अपने नाम का किरदार उस फ़िल्म में देखकर नाहर सिंह बेहद खफा हुए। उनके मन में ये बात घर कर गयी कि जगदीप का किरदार उनसे ही प्रेरित है।
नाराजगी में उन्होंने जावेद अख़्तर को इस बाबत मानहानि का लीगल नोटिस भी भेजा था। बहरहाल कुछ तो दम था उस किरदार की गढ़न में जो एक क्लासिक फ़िल्म में तमाम उम्दा कलाकारों के बीच अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज़ करवा सका कि हम जैसे फिल्मों से बेज़ार लोगों को भी याद रह गया।

