बिस्मिल के गीतों ने आजादी की लड़ाई में फूंकी थी जान

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राम प्रसाद बिस्मिल की 124 वीं जयंती पर विशेष

बहराइच। सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए- कातिल में है। ऐ शहीदों! मुल्कों- मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार, अब तेरी हिम्मत की चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है। ये पंक्तियां क्रांतिकारी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल की हैं। आज भी इनको गुनगुनाने वाले पूरे हिंदुस्तान में मिल जाएंगे।आजादी के इस दीवाने ने मात्र 30 वर्ष की आयु में काकोरी ट्रेन डकैती के आरोप में हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। साहित्य और क्रांति का यह दुर्लभ संयोग बहुत कम बार देखने को मिलता है। किसान पी.जी. कॉलेज, बहराइच में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ाने वाले शिक्षक डॉ.सत्यभूषण सिंह कहते हैं कि राम प्रसाद बिस्मिल में बाल जीवन से ही काव्य प्रतिभा विद्यमान थी। उन्होंने मात्र 16 वर्ष की आयु में ‘मैनपुरी की प्रतिज्ञा’ नाम से एक लंबी कविता लिखी थी। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कूदे थे। 19 दिसंबर 1927 को काकोरी ट्रेन डकैती के आरोप में राजेंद्र लाहिड़ी, अशफाकउल्ला खांऔर ठाकुर रोशन सिंह के साथ उन्हें भी फांसी दे दी गई। अपने जीवन काल में उन्होंने 11 पुस्तकें लिखीं। हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संघ जिसके सेनापति डॉ.राम प्रसाद बिस्मिल थे की ओर से जनवरी 1925 में क्रांतिकारी शीर्षक से एक पर्चा पूरे देश में बांटा गया था जो अंग्रेजी में था। इसका उद्देश्य था भारत के सम्मिलित राज्यों का एक ऐसा प्रजातांत्रिक संघ अथवा एक ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित करना है, जिसमें सभी प्रांतों को अपने घरेलू विषयों में पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त होगी तथा प्रत्येक बालिग और सही दिमाग वाले व्यक्ति को वोट देने का अधिकार होगा। साथ ही ऐसी शासन पद्धति समाज को देना जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण नहीं होगा। यह पर्चा मूल रूप में अंग्रेजी में तैयार किया गया था। इसे तैयार करने में शचींद्र नाथ सान्याल, यदु गोपाल मुखर्जी और राम प्रसाद बिस्मिल की भूमिका थी। यह बात राम प्रसाद बिस्मिल पर बिल्कुल सटीक बैठती है कि साहित्यकार जब लिखता है तब समाज बदलता है और जब पलटता है तब इतिहास बदलता है।

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