खादी को ब्रांडिंग के बजाए बॉन्डिंग की ज्यादा जरूरत

Abdul mueed

  1. कल से राजधानी में शुरू हुए खादी महोत्सव में सूबे के मुखिया एक बार फिर खादी की ब्रांडिंग में जुट गए। यह बात पहले भी प्रधानमंत्री कह चुके हैं।

दरअसल, खादी की कोई ब्रांडिंग नहीं कर सकता और न ही कोई कोई ब्रांड एंबेसडर बनाया जा सकता है। इसके ब्रांड एंबेसडर सिर्फ और सिर्फ बापू और कृपलानी थे। जिन्होंने भारत को एक ऐसा हथियार दिया जिससे लोगों को आर्थिक संकट से निजात दिलाई जा सकती थी।

खैर, बात चरखे की चली है तो बता दें कि गांधी का चरखा देश के लिए एक वैकल्पिक आर्थिक व्यवस्था का प्रतीक था। वो महिलाओं की आर्थिक स्थिति के लिए, उनकी आजादी के लिए भी महत्वपूर्ण था। उस किसान के लिए भी वो लाभ का यंत्र था जो किसान एक फ़सल बो कर छह महीने ख़ाली रहता था। इसलिए उस समय के भारत में चरखा इतना प्रभावी हुआ कि अमीर घरों की महिलाएं भी चरखा चलाने लगीं, सूत कातने लगीं।

महात्मा गांधी के निर्देश पर आचार्य जेबी कृपलानी ने सबसे पहले 1920 में उत्तर प्रदेश के वारणसी में गांधी आश्रम की स्थापना की थी। इसके पीछे उनका एक ही उद्देश्य था कि खादी के कपड़े व चरखे को भुखमरी व गरीबी के खिलाफ हथियार बनाया जाए। इसमें बेराजगारों को रोजगार दिया जाए। इसके जरिये उस समय महात्मा गांधी व उनकी विचारधारा से जुड़े लोगों का सपना साकार हुआ।

खादी विचारों के सूत से बना एक ऐसा वस्त्र है जिसे गांधी, नेहरू, पटेल, मोहानी, लोहिया और दीनदयाल ने धारण किया। जिसने अपनी ब्रांडिंग से सभी को बॉन्ड कर रखा था। देश को ऐसे स्वदेशी वस्त्र की जरूरत है जो लोगों को जोड़ सके।

गांधी का चरखा अंग्रेजों के खिलाफ देश की आजादी में कारगर हथियार तो बना, लेकिन गांधी आश्रम के सौ साल पूरे होने से पहले ही उनका यह सुनहरा सपना धूल में मिलता हुआ दिखाई दे रहा है। हालात यह हैं कि लाखों हाथों को रोजगार देने वाले गांधी आश्रम के हजारों कार्यकर्ता व इससे जुड़े लोग मामूली वेतन पर काम करने को मजबूर हैं। या दूसरे शब्दों में कहें तो भुखमरी के कगार पर खड़े हैं। इन गांधी आश्रमों को बचाने के बजाए ब्रांडिंग करके उनका उपहास उड़ाया जा रहा है।

*पाटेश्वरी प्रसाद*
अध्यक्ष
हिंदी पत्रकार एसोसिएशन, बाराबंकी
उत्तर प्रदेश

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