सच्ची मोहब्बत व अकीदत रखना ईमान का हिस्सा है : मौलाना इस्लामुदीन
एसएम न्यूज़24टाइम्स जिला ब्यूरो के साथ नेवाज अंसारी की रिपोर्ट 7268941211
देवा बाराबंकी। आले रसूल की पैरवी सच्ची मोहब्बत व अकीदत रखना ईमान का हिस्सा है। दुनिया के बड़े ताजदार तो मिट सकते है। बड़े बड़े ज़ालिम बाद शाह नष्ट हो सकते है मगर राह खुदा में अपने प्राण को क़ुर्बान करने वाले सदेव ज़िंदा रहेंगे। क्यूँकि हयात शोहदा की गवाही क़ुरान दे रहा है। उक्त बातें दरगाह हज़रत क़ुर्बान अली शाह दादा मियाँ के सज्जादा नाशीन हाजी साय्येद उस्मान गनी शाह के समा खाने में आयोजित महफ़िलें मिलाद और ज़िक्र शोहदाए करबला के अवसर पर मौलाना इस्लामुदीन ने कहीं। मौलाना ने आगे कहा की फिरौन मिट गया नमरुद फ़ना हो गया, अबुजहेल ख़त्म हो गया और यज़ीद बे निशान हो गया मगर सैय्यदा फ़ातिमा का लाल अभी ज़िंदा हैं। उनके नाम लेवा और उनके ग़ुलाम अभी भी ज़िंदा हैं। मौलाना ने कहा की हज़रत इमाम हुसैन ने करबला की ज़टमीन पर सच्चाई और झूठ के बीच रेखा खींच कर ऐलान कर दीया की इस्लाम के लिए सब कुछ क़ुर्बान कर देना ही एक मोमिन की शान होना चाहिए। हज़रत इमाम हुसैन किसी जाती धर्म तक सीमित नहि बल्कि पुरी इंसानियत के है। हज़रत इमाम हुसैन ने मैदान करबला में हक़ और इंसाफ़ के लिए शाहादत पेश कर न सिर्फ़ इस्लाम बल्कि इंसानियत को बचाया। मौलाना इसलामदीन ने कहा की हज़रत इमाम हुसैन एक शख़्स का नाम नहीं बलकी एक पैग़ाम है। जो हर दौर मे मज़लूम व मजबूर इंसानो को सच्चाई व ईमानदारी से हालत का मुक़ाबला करने का हौसला देता है। क़ुरान व अहलेबैत के अलावा निजात का कोई रास्ता नही है। उनका ज़िक्र इबादत है। करबला की जंग धर्म और अधर्म के बीच हुई। संख्या मे कम होते हुए भी हज़रत इमाम हुसैन कामीयाब हुए और शहादत का दर्जा पाकर क़यामत तक के लिए अमर हो गये।मौलाना ने आगे कहा की वकियते करबला से यह पैगाम मिलता है कि ज़ुल्म के आगे सिर ना झुकाया जाए और नवास ए रसूल हज़रत हुसैन के इसी जज़्बे को पेश किया। ख़ानदान-ए- नबुवत के चश्मों चराग ईमाम हुसैन रज़ी ने हक़ की सर बुलंदी के लिए अपनी जान का नज़राना पेश किया।मौलाना ने ये भी कहा की जो अली और उनकी आल का दुश्मन वो इस्लाम का दुश्मन हैं। अल्लाह ज़ालिम और क़ातिल को कभी माफ़ नही करेगा। इस अवसर पर महफ़िल की अध्यछता सज्जादानशीन हाजी सैय्यद उस्मान गनी शाह ने की। मेहमानो का शुक्रिया सैय्यद अयान गनी ने अदा किया। इस अवसर पर अकीदतमंद मौजूद थे।
दुनिया को शांति भाईचारा और मेल मोहब्बत का संदेश देने वाले महान सूफ़ी संत हज़रत हाजी सैय्यद वारिस अली शाह के पिता हज़रत सैय्यद क़ुर्बान अली शाह दादा मियाँ का ऐतिहासिक कुल शरीफ़ अपनी पुरानी परम्परा और अकीदत के साथ 24 अक्टूबर को दिन मे तीन बजे संपन्न होगा। विदित हो की महान सूफ़ी संत हज़रत हाजी वारिस अली शह ने लगभग 142 वर्ष पूर्व अपने पिता हज़रत क़ुर्बान अली शह दादा मिया की याद में हिंदी माह के कार्तिक माह मे देवा मेला के तौर पर शुरूवात की थी। अपने पिता की याद मे इतना भव्य मेला लगाने के पीछे हज़रत वारिस अली शाह का मक़सद ये था की साल मे एक जगह ऐक समय मे अपने मुरीदो और चाहने वालों को जमा करके मुलाक़ात (दर्शन)देना था क्यूँकि वारिस पाक ज़्यादातर सफ़र पर रहा करते थे। जिसके कारण मुरीद और चाहने वालों से मुलाक़ात नही हो पाती थी हज़रत वारिस पाक के द्वारा डाली गयी कुल शरीफ़ की ऐतिहासिक परम्परा को आज दरगाह हज़रत सैय्यद क़ुर्बान अली शाह दादा मियाँ के आस्ताने के सज्जादा नाशीन हाजी सय्यद उस्मान गनी शाह द्वारा अदा की जाएगी।
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