संतों ने प्रवचनों के माध्यम ज्ञान रूपी गंगा बहा कर श्रोताओं को किया मंत्रमुग्ध

मामुन अंसारी जिला ब्यूरो बाराबंकी(एस0एम0 न्यूज 24 टाइम्स)9044641489

देवा, बाराबंकी। विकास खण्ड देवा क्षेत्र के श्री गौपेश्वर नाथ धाम पेनातालाब पींड में चल रही शतचंडी महायज्ञ में संतों ने प्रवचनों के माध्यम ज्ञान रूपी गंगा बहा कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया संगीतमय कथा सुनकर सोता तालियां बजाते और झूमते नजर आए। विद्याकुल अयोध्या से पधारे सुरेन्द्रनन्द शास्त्री ने कहा कि तप का संसार भी बड़ा ही महत्व है इसके द्वारा असंभव कार्य को भी संभव किया जा सकता है। कथा को आगे बढ़ाते हुये कथावाचक पूर्णिमा ने कहा कि स्त्री को अपनी मर्यादा की सीमा कभी नहीं लांघना चाहिये क्योकि इसमें परिणाम गंभीर होते है। जब भगवान राम पत्नी सीता व अनुज लखन के साथ वनवास के समय पंचवटी में निवास कर रहे थे एक दिन सीता को कुटिया के समीप एक स्वर्ण मृग को देखा और राम से उस मृग को लाने की इच्छा जाहिर की भगवान राम ने लक्ष्मण को सीता की रखवाली करने की बात कहकर हिरण को पकड़ने के लिऐ गये मायारुपी हिरण राम को दूर जंगल में लेकर चला जाता है भगवान के तीर चलाने पर वह हिरण राम की आवाज बनाकर लक्ष्मण और सीता को आवाज देता है जिसको सुनकर सीता व्याकुल होती है और लक्ष्मण से प्रभु की मदद करने के लिऐ कहती है तो लक्ष्मण कहते है कि राम कभी संकट में नहीं हो सकते है लेकिन सीता के द्वारा ज्यादा विवश करने पर कुटिया के चारो तरफ एक रेखा खीचते है और सीता से किसी भी दशा में रेखा से बाहर ना निकलने की बात कहकर जंगल में चले जाते है। उसी समय लंका का राजा रावण साधु का भेष बनाकर कुटिया के बाहर भिक्षा मांगता है जब सीता भिक्षा लेकर कुटिया से बाहर निकलती तो रावण कहता कि तुम इस रेखा के बाहर आकर भिक्षा दो क्योकि मैं बंधी भिक्षा नहीं लूंगा यह बात सुनकर सीता धर्मसंकट में पड़ जाती है और अंततः रेखा पार कर भिक्षा देने के लिये रावण के पास आती तभी तपसी भेष रावण अपनी वास्तविक रूप में आ जाता है और सीता को रथ में बैठाकर लंका को प्रस्थान करता ह। इस मौके उमेश मौर्या, विजय वर्मा, संजय मौर्या, महेश वर्मा, जगेस मौर्या, आनंद सहित कई लोग मौजूद रहे।

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