जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश, की तहसील सिरौलीगौसपुर, ब्लॉक दरियाबाद स्थित कोटवाधाम-आभरण के पानी का रंग बदल गया है और इसे स्थानीय जन ,”ईश्वरीय करिश्मा” समझकर, बाबा जी का प्रसाद मानकर इस रंग बदले हुए पानी को बोतल में लोटे में बाल्टी आदि में ले जा रहे हैं। पानी ले जाने वालों की संख्या इतनी बढ़ी कि तहसील प्रशासन को सुरक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध करना पड़ा है। पुलिस व राजस्व विभाग को डियूटी लगानी पड़ी है।
कभी हरख ब्लॉक के पारादीपू ग्राम में कई वर्ष पूर्व एक बरगद के पेड़ से खून बहने की अफवाह फैली। मैं भी देखने गया जो मैंने देखा वो हास्यास्पद था किंतु दर्जनों गाँवों के लोग दौड़ पड़े। विशेषकर महिलाएं। कुछ दिन तक चला ये दौर फिर सब शांत। पर अब उस बरगद के पास प्रत्येक शुक्रवार को पूजा पाठ आदि का क्रम चल रहा है आज भी।
याद रहे कि इसी सिरौलीगौसपुर तहसील में ही कई वर्ष पूर्व ताजियों का उठकर खड़ा हो जाना तथा रात में घोड़ों की दौड़ने की आवाजों का आना जैसी अफवाह फैलाई गई थी। जिसे प्रदेश सरकार ने भी संज्ञान लिया था। कई जिलों तक ऐसी अफवाह फैली थी आसपास जिलों के लोग आने जाने लगे थे।
मजेदार ये कि जब दैनिक जागरण के तत्कालीन राज्य-पत्रकार श्री नदीम जी मौके पर पहुँच कर हकीकत जानने की पड़ताल करते हैं तो एक भी बन्दा नहीं मिला उन्हें जो कहे कि घोड़ों की टॉप सुनी हो, या ताजिये खड़े देखे हों। अफवाह को खण्डित करते हुए श्री नदीम जी की यह पड़ताल-रिपोर्ट तत्समय दैनिक जागरण में प्रकाशित हुई थी। आज उसी धरती पर लगभग बीस बरस बाद एकबार फिर एक अफवाह जैसी स्थिति है। कोटवाधाम-आभरण का पानी देखकर वापिस हुये भाजपा युवा नेता / सामाजिक कार्यकर्ता श्री तुलसीराम चौहान से मेरी अकस्मात मुलाकात होती है और वे बताते हैं कि “पानी का रंग हल्का सफेद है, जिसे ठीक से दूधिया रंग भी नहीं कहा जा सकता है।”
दूध समझ कर आभरण के पवित्र जल को जिसे लोग ले जा रहे हैं उसमें चाहे प्राकृतिक भूगर्भ-आन्तरिक प्रक्रिया के तहत रंग बदला हो अथवा किसी ने शरारतन अफवाह फैलाने के लिए आभरण के पवित्र जल में कुछ मिलाया हो अथवा बाबा जी की कृपा से जल का रंग बदल गया हो , जागरूक लोगों का और जिम्मेदार लोगों का ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि इस अचानक रंग बदले हुए जल में कौन से तत्व का मिश्रण है जिससे आभरण के पवित्र-जल का रंग दूध जैसा हुआ है। ये तो निश्चित है कि आभरण-जल का रंग बदला है तो आभरण-जल की संरचना में रासायनिक परिवर्तन अवश्य हुआ है। आभरण के सामान्य जल में तथा आभरण के रंग बदले हुए जल में क्या अन्तर आया है स्वाद में, आयतन में, पारदर्शिता में, रासायनिक तत्वों में…?? इस बदलाव का अध्ययन होना चाहिए क्योंकि ये मामला सिर्फ आस्था और श्रद्धा का ही नहीं है बल्कि जन सामान्य के स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। मेरी अपनी निजी राय है कि ऐसी घटनाओं की जानकारी पर जिम्मेदारों को तत्काल आभरण जल ले जाने पर रोक लगानी चाहिए और जल परीक्षण कराने के पश्चात जल ले जाने की अनुमति प्रदान करनी चाहिए थी। क्योंकि अगर किसी की शरारत निकले तो अथवा भूगर्भ से भी स्वयमेव किसी प्राकृतिक घटना के परिणाम स्वरूप किसी ऐसे तत्व की अधिकता के कारण रंग बदला हो जो जनस्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो तब समाज और प्रशासन के जिम्मेदारों पछताना होगा। किसी वस्तु अथवा घटना पर कुछ मानना यानी कल्पना करना, श्रद्धा, आस्था का कारण होता है परन्तु उसी वस्तु अथवा घटना की सच्चाई को परखना जिम्मेदारों का दायित्व होता है।
आये दिन ट्रेन में विशेष कर प्रसाद खिलाकर लूट होती रही हैं। यानी प्रसाद के नाम पर आस्था श्रद्धा का होना और अंधविश्वास होना दोनों में अंतर है, भारी अंतर है।इसी आस्था श्रद्धा के नाम पर फैले अंधविश्वास को हथियार बनाकर यानी मानव मन की कमजोरी का फायदा उठाकर शरारती एवं स्वार्थी तत्वों द्वारा की गई लूट बलात्कार आदि की हजारों लाखों घटनाएं थानों विशेषकर रेलवे थानों के अभिलेखों में दर्ज हैं। हो सकता है कभी कोई शरारती तत्व किसी आस्थावान आभरण कुंआ आदि में पुनः रंग बदलने के लिए फुनायल, या कोई अन्य हानिकारक रसायन मिलाकर अफवाह फैलाये और आस्था व श्रद्धावश लोग जल श्रोत से प्रसाद प्राप्त करने हेतु दौड़ पड़ें, प्रसाद ग्रहण करके अस्वस्थ होने लगें तब क्या होगा अस्पताल और असप्तालों में बेड कम पड़ जाएंगे। भविष्य में कभी भी ऐसी अनहोनी को टालने के लिए समाज तथा प्रशासन के सभी जिम्मेदारों को पहले से ही एक वातावरण बनाना होगा कि अचानक ऐसी किसी भी घटना का परीक्षण किए बिना किसी को प्रसाद ले जाने की अनुमति न दी जाए। मात्र 24 से 36 घंटे में परीक्षण हो जाएगा फिर और व्यवस्थित स्वरूप में मेला तथा उत्सव के रूप में मनाते हुए लोग प्रसाद ग्रहण करें। जिस प्रकार का जहर समाज के आम लोगों के दिलों में घुल गया है घुलता जा रहा है ऐसे में सिरफिरे लोगों के लिए ऐसी खतरनाक भयावह घटनाओं को अंजाम देने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। सिरफिरापन एक प्रवृति है मानसिक बीमारी है ऐसे लोग हर जाति धर्म सम्प्रदाय में बीच बीच पाये जाते हैं।
मैं प्रदीप सारंग सभी सम्मानित भक्त जन, श्रद्धेय श्रद्धालु जन, आदरणीय आस्थावान जनों की कोमल पवित्र भावनाओं का आदर करता हूँ और समाज के व्यापक जनहित में यह अपील करता हूँ कि इतनी जल्दी दौड़ पड़ने की प्रवृत्ति पर विचार करें। इतनी जल्दी दौड़ पड़ना, बिना विचार किये दौड़ पड़ना, हमारी आपकी आस्था, हमारी आपकी श्रद्धा को अन्धविश्वास का रूप ले लेने में मददगार होती है। यदि जिम्मेदारों व जानकारों द्वारा परीक्षण के पश्चात प्रसाद ग्रहण करेंगे तो हमारे आपके व्यापक समाज के हित में ही है।
आस्था और श्रद्धा का भाव अथवा प्रवृति हमारे समाज को मजबूत बनाती है किंतु अन्धविश्वास की प्रवृत्ति हमारे समाज को खोखला बनाती है।
कृपया आस्था, श्रद्धा तथा अन्धविश्वास और आस्था श्रद्धा तथा अंधविश्वास की प्रवृत्ति को समझने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि भविष्य की अवसम्भावी, अनहोनी घटना के अस्तित्व की संभावना को शून्य बनाया जा सके।
ये प्रश्न अभी अनुत्तरित हैं कि आखिर इस प्रकार के घटनाक्रमों से क्या हासिल होता है किसे हासिल होता है..?? किसे होता है लाभ और किसे होता है नुकसान…?? क्यों रचे बुने जाते रहते हैं ऐसी प्रक्रियाओं के जाल..??
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