सीता स्वयंवर में शामिल हुए राजाओं महाराजाओं के असफल होने के उपरांत जैसे ही भगवान श्री रामचंद्र ने धनुष तोड़ा….

अवधेश कुमार वर्मा संवाददाता बाराबंकी

मसौली बाराबंकी । विकास खण्ड मसौली की ग्राम पंचायत ज्योरी स्थित दुर्गा मंदिर पर चल रही साप्ताहिक श्रीराम कथा में शुक्रवार को कथा व्यास कुलदीप मृदुलांश ने सीता स्वयंवर एवं लक्ष्मण परशुराम संवाद की कथा सुनाई।

राम और सीता विवाह के मार्मिक प्रसंग को सुनाया। पूरा प्रांगण भक्ति भाव से सराबोर हो गया। श्री महाराज ने कहा सीता स्वयंवर में शामिल हुए राजाओं महाराजाओं के असफल होने के उपरांत जैसे ही भगवान श्री रामचंद्र ने धनुष तोड़ा उसकी टनकार तीनो लोक में सुनाई दी। शिव धनुष टूटने की टनकार सुनकर तपस्या रत भगवान परशुराम की आंख खुल गई। वह सीधे जनकपुर पहुंचे और मिथिला नरेश से कहा कि जिस किसी ने भी शिव धनुष तोड़ी है उसे सभा से निकालकर मेरे समक्ष प्रस्तुत करो नहीं तो मैं सभी राजाओं को मार डालूंगा परशुराम के क्रोध को शांत करने का भगवान श्रीराम ने काफी प्रयास किया लेकिन वह शांत नहीं हुए। इस बीच भगवान परशुराम और लक्ष्मण का तीखा संवाद हुआ।
*लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना॥
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।*
भावार्थ:-लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा- हे देव! सुनिए, हमारे जान में तो सभी धनुष एक से ही हैं। पुराने धनुष के तोड़ने में क्या हानि-लाभ! श्री रामचन्द्रजी ने तो इसे नवीन के धोखे से देखा था।
*बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही॥
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।*
भावार्थ:-मैं तुझे बालक जानकर नहीं मारता हूँ। अरे मूर्ख! क्या तू मुझे निरा मुनि ही जानता है। मैं बालब्रह्मचारी और अत्यन्त क्रोधी हूँ। क्षत्रियकुल का शत्रु तो विश्वभर में विख्यात हूँ।
अंत में भगवान श्रीराम ने उनके तरकश में रखे हुए श्री नारायण अस्त्र को नष्ट कर स्वयं के नारायण होने का प्रमाण दिया तब जाकर उनका क्रोध शांत हुआ। इसके बाद राजा जनक ने संदेशवाहको को अयोध्या भेजकर महाराज दशरथ को श्री राम सीता विवाह में बारातियों संग शामिल होने का न्योता भेजा। अयोध्या से हाथी घोड़ों व रथो पर सवार होकर भारी संख्या में बाराती जनकपुर पहुंचे यह बड़े ही धूमधाम से भगवान राम और सीता का विवाह संपन्न हुआ।

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