कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर तीसरी बार होंगे विरासत के पहरेदार, अखिलेश-मायावती के दांव से रोमांचक हुआ रण

एटा की शुरूआती चुनावी तस्वीर अब पूरी तरह साफ हो चुकी है कि जंग के योद्धा कौन-कौन होंगे? जातियों पर पकड़ इस चुनाव का रुख तय करने वाली है। ज्यादा हलचल शाक्य प्रत्याशी के आने से है। सपा ने निरंतर दो बार हुई हार से सबक लेकर इस बार शाक्य प्रत्याशी को उतार दिया। हालांकि भाजपा अपने शाक्य नेताओं के सहारे वोटों का धुर्वीकरण कराने की कोशिश में है।इससे पहले 1977 में मुस्तफा रशीद शेरवानी ने लोकसभा का चुनाव लड़ा था। मगर वे हार गए थे। बाद में उनकी विरासत आगे बढ़ाने के लिए आए सलीम इकबाल शेरवानी ने 1989 में कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन वे भी हार गए। शेरवानी अपने पिता की विरासत को आगे नहीं बढ़ा पाए। शेष प्रत्याशियों ने खुद ही चुनाव लड़ा और आगे चलकर वे राजनीति से विलुत्प हो गए।वर्ष 2009 में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने एटा लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के समर्थन से चुनाव लड़ा था, रिकार्ड वोटों से जीत हुई। बाद में फिर से उनकी घर वापसी हुई और राजस्थान के राज्यपाल बने। इसके बाद वर्ष 2014 का चुनाव आया तो कल्याण सिंह ने चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया। उनके पुत्र राजवीर सिंह प्रत्याशी घोषित किए गए। उस चुनाव में कल्याण सिंह स्वयं कार्यकर्ताओं से मिलने आए थे और उनका उत्साह बढ़ाया था।इसके बाद वर्ष 2019 में फिर से राजवीर ने अपने पिता की विरासत संभाली और जीत दर्ज की। अब वे तीसरी बार विरासत के पहरेदार बने हैं। पार्टी ने हैट्रिक लगाने का मौका दिया है। दरअसल यहां की लड़ाई में भाजपा राष्ट्रीय मुद्दों पर मुखर है। मगर चुनाव जातिवाद के ट्रेक पर जाता नजर आ रहा है। जातीय समीकरणों का खेल खेलां करने को तैयार है।

 

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