भविष्य के हालात का पहले से अंदाज़ा कैसे लगा लेते हैं आयतुल्लाह ख़ामेनई? सुप्रीम लीडर के वह फ़ैसले जो उनकी दूरदर्शिता के सुबूत हैं!
समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने 1990 के दशक में यह विचार पेश किया कि देश की अर्थ व्यवस्था को तेल पर निर्भरता की स्थिति से बाहर निकाला जाना चाहिए।ईरान जैसे देश के लिए यह काम काफ़ी कठिन है क्योंकि ईरान की अर्थ व्यवस्था काफ़ी हद तक तेल से होने वाली आमदनी पर निर्भर थी।इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई ने कहा कि हमें देश की अर्थ व्यवस्था को ऐसी स्थिति में ले जाना चाहिए कि हम जब चाहें तेल के कुंओं को बंद कर दें। हमारे सामने यह मजबूरी न हो कि देश चलाना है तो हरहाल में तेल बेचना ही पड़ेगा।आयतुल्लाह ख़ामेनई का यह विचार उस समय सरकार में शामिल कुछ अधिकारियों को आश्चर्यजनक लगा था।
आयतुल्लाह ख़ामेनई का तर्क यह है कि तेल के बाज़ार पर उन देशों का नियंत्रण नहीं है जो तेल का उत्पादन कर रहे हैं बल्कि क़ीमतें दूसरी ताक़तें तय करती हैं।
आयतुल्लाह ख़ामेनई के इस सुझाव पर बहस होती रही और धीरे धीरे बहुत से अधिकारियों को यह लगने लगा कि हमें इस दिशा में आगे बढ़ने की ज़रूरत है। इसी उद्देश्य से 2011 में नेशनल विकास कोष की स्थापना की गई। ईरान की सरकार को तेल से होने वाली आमदनी का बीस प्रतिशत भाग इस कोष में डालना होता है। यह तय हुआ था कि कार्यक्रम के अनुसार इस मात्रा को लगातार बढ़ाया जाएगा ताकि देश का बजट कोष में धन जमा हो जाने के बाद शेष बची रक़म के आधार पर तैयार किया जाए और बजट की ज़रूरत की बाक़ी रक़म दूसरे स्रोतों से मुहैया की जाए। ईरान इस शैली के माध्यम से अर्थ व्यवस्था को तेल पर निर्भरता से आज़ाद कर रहा है।
आज जब तेल के बाज़ारों में भारी संकट है और तेल उत्पादक देशों के सामने बड़ी गंभीर चुनौती उत्पन्न हो गई है तो तेल से निर्भरता कम हो जाने के कारण ईरान की अर्थ व्यवस्था इन हालात में भी मज़बूती से खड़ी है।
1990 के दशक में ही ईरान में एक बहस यह छिड़ गई कि देश के भीतर गेहूं की खेती किस पैमाने पर होनी चाहिए। कुछ विशेषज्ञों का कहना था कि हम गेहूं के बजाए केसर जैसे उत्पाद तैयार करें तो इससे काफ़ी फ़ायदा होगा। मगर इस बहस में भी सुप्रीम लीडर का कहना था कि गेहूं बुनियादी ज़रूरत की चीज़ है। इस प्रकार की चीज़ों के लिए हम देश को विदेशों से की जाने वाली ख़रीदारी पर निर्भर नहीं कर सकते।
बाद के वर्षों में जब ईरान पर अमरीका के प्रतिबंध बहुत कठोर हो गए तो यह बात सबकी समझ में आई कि बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों के संबंध में देश का आत्म निर्भर रहना बेहद ज़रूरी है।
ईरान और अमरीका के बीच परमाणु मुद्दे पर वार्ता हुई और वार्ता लंबी चली। शुरू से ही सुप्रीम लीडर कह रहे थे कि अमरीकियों पर हरगिज़ भरोसा नहीं किया जा सकता। 2015 में *परमाणु समझौता भी हो गया लेकिन 2018 में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने वह समझौता तोड़ दिया जिस पर ख़ुद अमरीका ने हस्ताक्षर किए थे।
ईरान का नेतृत्व आज आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनई के हाथ में है और अब वह देश की अर्थ व्यवस्था को आत्म निर्भर अर्थ व्यवस्था की ओर ले जा रहे हैं जिसमें सबसे ज़्यादा ज़ोर उत्पादन को बढ़ाने पर है। इसके लिए छोटे और मझले स्तर के उद्योगों को सरकार की ओर से बढ़ावा दिया जा रहा है।….

