बाराबंकी में फर्जी ‘यू-ट्यूब पत्रकारों’ का साम्राज्य — पत्रकारिता की गरिमा पर गहरा संकट
अवधेश कुमार वर्मा संवाददाता बाराबंकी
बाराबंकी जनपद में इन दिनों एक चिंताजनक और गंभीर प्रवृत्ति तेजी से पैर पसार रही है। शासन-प्रशासन की कथित ढिलाई के चलते “फर्जी यू-ट्यूब पत्रकारों” का एक ऐसा जाल बिछ चुका है, जिसने न केवल पत्रकारिता की साख को धूमिल किया है, बल्कि आम जनता, सरकारी विभागों और कानून व्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा उत्पन्न कर दिया है।

बिना मान्यता, फिर भी ‘सबसे बड़े पत्रकार’ का दावा
इन तथाकथित पत्रकारों के पास न तो किसी मान्यता प्राप्त अखबार का आरएनआई पंजीकरण है और न ही ये किसी विश्वसनीय मीडिया संस्थान से जुड़े हैं। बावजूद इसके, ये स्वयं को “जिले का सबसे बड़ा पत्रकार” बताकर समाज में भ्रम का जाल फैला रहे हैं।
यूट्यूब, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म इनके लिए हथियार बन चुके हैं, जिनके माध्यम से ये खबरों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करते हैं।
💰 डर, दबाव और धन उगाही का खेल
सूत्रों की मानें तो ये फर्जी पत्रकार छोटी-छोटी घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर अधिकारियों और आम नागरिकों पर दबाव बनाते हैं। वीडियो और फोटो के नाम पर ब्लैकमेलिंग, धमकी और धन उगाही जैसे गंभीर आरोप इन पर लग रहे हैं।
कुछ फर्जी संस्थाएं तो मात्र 1000 से 5000 रुपये लेकर “प्रेस कार्ड” तक जारी कर रही हैं—जिससे इस अवैध धंधे को खुला संरक्षण मिलता दिखाई दे रहा है।
🌙 रात में सक्रिय गिरोह, दिन में ‘कवरेज’ का दिखावा
सफदरगंज थाना क्षेत्र में इनकी सक्रियता सबसे अधिक देखी जा रही है। ये लोग संगठित गिरोह की तरह रात के समय भी घूमते नजर आते हैं।जिससे छेत्र में अक्सर अपराधिक घटनाओ का होना भी इनकी तरफ इसरा करता है
हाल ही में सैदनपुर नर्सरी में पौधों को उतार रहे वनकर्मियों के साथ गाली-गलौज और धमकी का मामला सामने आया, जिसकी लिखित शिकायत थाना सफदरगंज में दी गई—परंतु आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
यही कारण है कि इनके हौसले बुलंद हैं।
🌳 वन विभाग पर सुनियोजित निशाना
इन फर्जी पत्रकारों ने वन विभाग को अपना मुख्य लक्ष्य बना लिया है। आरोप है कि ये पहले वन माफियाओं से सांठगांठ कर वसूली करते हैं, फिर उसी मुद्दे पर फर्जी शिकायतें और खबरें चलाकर अधिकारियों को बदनाम करने का प्रयास करते हैं।
🔎 जांच में खुली सच्चाई:
मुस्काबाद: महुआ का पेड़ वैध परमिट से कटा—शिकायत झूठी
मीरपुर: एक आम का पेड़ कटा, जिस पर पहले ही जुर्माना हो चुका था
सिकली का पुरवा: 10 पेड़ों की शिकायत में केवल 4 कटे, जिन पर पूर्व में कार्रवाई
अहिरनपुरवा: जनवरी में परमिट के तहत कटान, बाद में फर्जी शिकायत
शहादतगंज: रामलीला मैदान में वैध कटान के बावजूद शिकायत
जमलापुर : छोटी नहर के किनारे 16 पेड आम के कटान कि शिकायत कि गईं जिसमे 9 आम पेड़ो पर पहले हीं जुर्माना हो गया था यह शिकायत भी फर्जी निकली
इन सभी मामलों में जांच के बाद शिकायतें भ्रामक और निराधार साबित हुईं, फिर भी संबंधित अधिकारियों की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की गई।
उप वन क्षेत्राधिकारी मनोज कुमार यादव और चौकी प्रभारी सैदनपुर विभूति कुमार द्विवेदी जैसे अधिकारियों को भी निशाना बनाया गया।
🚨 प्रशासन की चुप्पी—सबसे बड़ा सवाल
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?
क्या प्रशासन इन फर्जी पत्रकारों के बढ़ते नेटवर्क से अनजान है, या फिर जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है?
पुलिस चेकिंग के दौरान “प्रेस” का रौब दिखाकर बच निकलना इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं सिस्टम में खामियां हैं।
📰 असली पत्रकारिता पर गहरा आघात
इन तथाकथित पत्रकारों की हरकतों से ईमानदार और पेशेवर पत्रकारों की छवि धूमिल हो रही है।
पत्रकारिता, जो समाज का आईना और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती है, आज ऐसे लोगों के कारण अविश्वास के संकट से जूझ रही है।
⚖️ अब जरूरी है कड़ी कार्रवाई
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को तुरंत ठोस कदम उठाने होंगे:
🔹 फर्जी पत्रकारों की पहचान कर व्यापक सत्यापन अभियान
🔹 अवैध प्रेस कार्ड और फर्जी संस्थानों पर प्रतिबंध
🔹 सोशल मीडिया पर भ्रामक खबर फैलाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई
🔹 सरकारी कर्मचारियों को सुरक्षा और स्पष्ट दिशा-निर्देश
🔹 मान्यता प्राप्त पत्रकारों की सूची सार्वजनिक करना
📝 निष्कर्ष: अब फैसला प्रशासन के हाथ में
बाराबंकी में फर्जी पत्रकारों का यह बढ़ता जाल केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले दिनों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस चुनौती का सामना कैसे करता है—कठोर कार्रवाई के साथ या फिर चुप्पी के साथ?

