अभी शांति समझौते की सियाही सूखी भी नहीं थी कि अमरीका ने समझौता तोड़ दिया, वाॅशिंग्टन का अतीत भी यही दिखाता है ..

समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ

तालेबान के साथ अमरीका के शांति समझौते का नतीजा अफ़ग़ानिस्तान की जनता के लिए एक अंधेरी गुफा में घुसने जैसा ही होगा।
जैसा कि अमरीकी सरकार से अपेक्षा थी, उसने तालेबान गुट के साथ हुए शांति समझौते की सियाही सूखने से पहले ही इस गुट ठिकानों पर हमला करके यह सिद्ध कर दिया कि पिछले राष्ट्राध्यक्षों की तरह ट्रम्प भी किसी समझौते का पालन नहीं कर सकते। हालांकि अमरीकी संचार माध्यम तालेबान के ठिकानों पर अमरीका के हवाई हमले को एक ज़रूरी व अभूतपू्र्व कार्यवाही बता रहे हैं जिसे अफ़ग़ानिस्तान की रक्षा जारी रखने को सिद्ध करने के लिए अमरीकी सैनिकों को अंजाम देना ही चाहिए था लेकिन यह कार्यवाही इस बात को भी साबित करती है कि अमरीका, किसी भी समझौते का पालन नहीं करता। तालेबान कोई पहला उदाहरण नहीं है जिसके साथ समझौता करके अमरीका ने उसे तोड़ दिया हो। ईरान व गुट पांच धन एक के बीच होने वाला परमाणु समझौता, उत्तरी कोरिया व अमरीका के बीच होने वाला समझौता और इराक़ के साथ अमरीका के समझौतों पर नज़र डालने से भी यही बात सिद्ध होती है कि अमरीका पर बिलकुल भी विश्वास नहीं किया जा सकता।
 
अमरीका व उत्तरी कोरिया के बीच वार्ता को लगभग दो साल का समय बीत रहा है। वार्ता आरंभ होने से पहले ही अमरीका ने इस बात पर सहमति जताई थी कि जैसे ही वार्ता शुरू होगी, वह उत्तरी कोरिया पर लगे बहुत से प्रतिबंध हटा लेगा लेकिन पूरी दुनिया ने देखा कि न सिर्फ़ यह कि उत्तरी कोरिया पर लगे प्रतिबंधों में से कोई भी प्रतिबंध नहीं हटाया गया बल्कि इस देश के ख़िलाफ़ अमरीकी मीडिया के हमले और भी तेज़ हो गए। हालांकि अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने कई बार उत्तरी कोरिया के नेता किम जोंग ऊन को बड़ी अच्छी विशेषताओं के साथ संबोधित किया लेकिन हम देखते हैं कि व्यवहारिक रूप से उन्होंने किम जूंग ऊन को नुक़सान पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं किया।

सभी को याद है कि ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद दुनिया के जिन नेताओं ने सबसे पहले वाॅशिंग्टन की यात्रा की थी उनमें चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग भी थे। ट्रम्प ने उन्हें फ़्लोरिडा में अपने घर भी आमंत्रित किया था। शी जिन पिंग ही थे जिनके लिए ट्रम्प का परिवार बिछा जा रहा था लेकिन हम देखते हैं कि ट्रम्प ने अपनी सत्ता के दौरान सबसे अधिक आर्थिक दबाव चीन पर ही डाला बल्कि कुछ लोगों का तो मानना है कि अमरीका ने ही चीन से आर्थिक मुक़ाबले के लिए इस देश में कोरोना वायरस फैलाया है। अमरीका के यूरोपीय घटकों के सिलसिले में भी हम देखते हैं कि अमरीका ने उनके साथ जितने भी आर्थिक समझौते किए थे, ट्रम्प ने उन्हें तोड़ दिया बल्कि जिन यूरोपीय नेताओं के साथ ट्रम्प खाने की मेज़ पर बैठे थे, उनके आदेश पर सीआईए ने उन सबके ख़िलाफ़ साज़िशें कीं।

बहुत पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है, अगर हम एक दो हफ़्ते पहले की घटनाओं पर ही नज़र डालें तो देखेंगे कि जब तुर्की ने नेटो के समर्थन से सीरिया में शक्ति प्रदर्शन करना चाहा तो अमरीका ने भी और यूरोपीय देशों ने भी उसका साथ छोड़ दिया। इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान के बारे में भी, जो एक तरह से अमरीका के क़ब्ज़े में हैं, हम देखते हैं कि अमरीका ने बड़ी आसानी से उन नेताओं का साथ छोड़ दिया जो उससे पूरा सहयोग कर रहे थे, इतना ही नहीं बल्कि अमरीका ने उनके विरोधियों का साथ दिया। कुर्दों के मामले को कौन भूल सकता है जिन्होंने अपनी जान और माल से क्षेत्र में अमरीका के हितों की रक्षा की लेकिन अंततः ट्रम्प ने कहा कि वे अमरीका के सेवक थे, उनके साथ हमारा एक समझौता था जो पूरा हो गया और हमने उन्हें उसका बदला दे दिया है और हमें उनसे कोई लेना देना नहीं है। ट्रम्प ने अपने इस वाक्य से संसार के अन्य देशों के बारे में अमरीका के विचार को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया।

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