कथा व्यास कुलदीप मृदुलांश ने राम वन गमन एवं केवट संवाद की कथा का बखान किया।
अवधेश कुमार वर्मा संवाददाता बाराबंकी
मसौली बाराबंकी । विकास खंड मसौली की ग्राम पंचायत ज्योरी स्थित दुर्गा मंदिर पर चल रही साप्ताहिक श्रीराम कथा में शनिवार को कथा व्यास कुलदीप मृदुलांश ने राम वन गमन एवं केवट संवाद की कथा का बखान किया। जिसमें महाराज जी ने कहा-

अपने चारों पुत्रों के विवाह के पश्चात राजा दशरथ का एकमात्र सपना था कि वह अपने जेष्ठ पुत्र राम को अयोध्या नगरी का राजा बनाए।लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था जिस वजह से राम की सौतेली माता राजा दशरथ की दूसरी पत्नी महारानी केकई की दासी मंथरा ने उनको उकसाया।तब रानी कैकई को राजा दशरथ द्वारा दिए गए दो वरदान का स्मरण हो आया जो उन्होंने देवासुर संग्राम में रानी केकई को उनके युद्ध में साथ देने के लिए दिए थे। तब रानी कैकई ने राजा दशरथ से वरदान में यह मांगती है कि राम को 14 वर्ष का वनवास दिया जाए। जिसमें राम 14 बरस तक वन में रहेगा और राज्य की किसी भी वस्तु का उपयोग नहीं कर सकेगा। दूसरे वचन में रानी कैकई राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाने की मांग करती है।
रानी कैकई के यह दोनों वचन सुनकर राजा दशरथ को सदमा लगता है और वह बेजुबान हो जाते है। अगले ही दिन जब राम के वनवास की खबर नगर में फैलती है तो पूरे नगर में बगावत जैसे स्वर फूटने लगते है। देवी सीता अपने पति श्रीराम के साथ वनवास पर जाने का निश्चय करती है।जब लक्ष्मण जी को यह सूचना मिलती है तो वह राजा दशरथ पर क्रोधित होते है लेकिन श्रीराम के समझाने पर वह शांत हो जाते है। लक्ष्मण अपने भैया राम से बहुत स्नेह करते थे इसलिए वे भी श्रीराम के साथ वनवास पर जाने के लिए कहते हैं।
*मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना*
*चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई*
जब भगवान राम वन जाने के लिए गंगा घाट पर खड़े होकर केवट से नाव लाने को कहते हैं, लेकिन केवट मना कर देता है और पहले पैर पखारने की बात कहता है। केवट भगवान का पैर धुले बगैर नाव में बैठाने को तैयार नहीं होता है। कृपा के समुद्र श्री रामचन्द्रजी केवट से मुस्कुराकर बोले भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाए। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे।चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस जल (चरणोदक) को पीकर पहले (उस महान पुण्य के द्वारा) अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनंदपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्रजी को गंगाजी के पार ले गया।प्रभु को संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं।पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनंद भरे मन से अपनी रत्न जडि़त अँगूठी (अँगुली से) उतारी। कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए।
उसने कहा-हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी।
प्रभु श्री रामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी ने बहुत आग्रह (या यत्न) किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणा के धाम भगवान श्री रामचन्द्रजी ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर उसे विदा किया। शिवकुमार गुप्ता धर्मेन्द्र गुप्ता पवन कुमार वर्मा सूरज गुड्डू ओमप्रकाश वर्मा आदि मौजूद रहे।

