अलविदा अख़गर साहब: सहसवान के मशहूर शायर और वरिष्ठ पत्रकार सिब्तेन अख़गर सुपुर्द-ए-खाक, अदबी दुनिया में शोक

मुकीम अहमद अंसारी

सहसवान, बदायूं। अदब, तहज़ीब और पत्रकारिता के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया है। सहसवान की माटी के गौरव, मशहूर शायर, वरिष्ठ पत्रकार और अधिवक्ता सैय्यद एस.एन.आर. नक़वी उर्फ़ ‘सिब्तेन अख़गर’ साहब का लंबी बीमारी के बाद दिल्ली में इंतिक़ाल हो गया। उनके निधन की सूचना मिलते ही सहसवान सहित पूरे जनपद में शोक की लहर दौड़ गई। उनके पार्थिव शरीर को पैतृक निवास लाने के बाद, कोट स्थित कब्रिस्तान में नम आंखों से सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
अदब और पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति
सिब्तेन अख़गर साहब केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इंसानियत और इल्म की एक जीती-जागती मिसाल थे। उन्होंने अपनी लेखनी और वकालत के माध्यम से हमेशा सच और इंसाफ की आवाज बुलंद की। उनकी मशहूर किताब ‘लमयाजिल’ ने उन्हें न केवल देश में बल्कि विदेशों के साहित्यिक हलकों में भी एक विशिष्ट पहचान दिलाई। उनकी शायरी में समाज का दर्द और वक्त की कड़वी सच्चाई साफ झलकती थी, जिसे उर्दू अदब के प्रेमियों ने हमेशा सराहा।
पत्रकारिता और वकालत में अमिट छाप
साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उनका योगदान अविस्मरणीय रहा। उर्दू दैनिक ‘क़ौमी आवाज़’ में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में उन्होंने वर्षों तक दबे-कुचले समाज की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। एक बेबाक लेखक के साथ-साथ वे एक कुशल अधिवक्ता भी थे। उनके निधन पर बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं ने दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और इसे वकालत जगत के लिए एक बड़ी क्षति बताया।
नम आंखों से दी अंतिम विदाई
सोमवार दोपहर बाद करीब 2:30 बजे नमाज़-ए-जनाज़ा के बाद उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। जनाजे में पत्रकारिता, साहित्य, राजनीति और सामाजिक संगठनों से जुड़ी तमाम हस्तियों के साथ-साथ भारी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए। हर किसी की आंखें अपने चहेते शायर और रहनुमा के जाने से नम थीं। उपस्थित लोगों ने उन्हें खिराज-ए-अक़ीदत पेश करते हुए कहा कि अख़गर साहब भले ही दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनके लफ्ज़ और उनकी शायरी हमेशा जिंदा रहेगी।

*मुकीम अहमद अंसारी ब्यूरो चीफ एसएम न्युज 24 टाइम्स बदायूं*

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