लखपति हुईए गए प्रधान, मजदूर हो रहे कंगाल -मजदूरों की मंडी कही खतरे की घंटी तो नही? जनपद में मजदूरों की अनदेखी कहीं भारी न पड़ जाये। -श्रम विभाग द्वारा मजदूरों को जागरूक नही किया जा रहा है, कई जगह लगती है मण्डी सैंकड़ों की संख्या में आते हैं मजदूर।
नितेश मिश्रा/अब्दुल मुईद की रिपोर्ट एसएम न्यूज़
- बाराबंकी। जनपद के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधानों को मिलने वाली सरकारी सहायता से वह लखपति हो रहे हैं लेकिन गांव में बाहर से आये मजदूरों को प्राथमिक विद्यालय में न रोककर उनको घर भेज दिया जाता है और शासन से प्राप्त सरकारी धनराशि को प्रधान जी हड़प करके बंदरबांट करते हैं। यह मामला जिले की एक ग्राम सभा का नहीं है, यही हाल लगभग सभी ग्राम सभाओं का है। प्रधान जी ज्यादातर लोगों को क्वारंटीन न करके उनको सीधे घर भेज देते हैं और क्वारंटीन के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंककर आगामी प्रधानी चुनाव की तैयारी में जुट जाते हैं।
मालूम हो कि शासन द्वारा क्वारंटीन व्यक्ति के खाने, पीने आदि का जो खर्चा आता है उसको प्रधान ही डकार जाते है। मजदूरों के जागरूक न होने का पूरा पूरा फायदा प्रधान जी उठाते हैं। बाहर से आये मजदूर दो-तीन बाद जब काम धंधा के सिलसिले में मजदूरी करने बाहर निकलते और तब तक कई लोगों में संक्रमण फैला देते हैं। जांच रिपोर्ट आने में लगभग 4-5 दिन लग जाते हैं। प्रधान द्वारा खेले गये खेल से आम मजदूर के साथ साथ पूरे जनपद की जनता प्रभावित होती है। अगर प्रधान द्वारा सही तरीके से बाहरी मजदूरों को भोजन, रहने की व्यवस्था आदि उपलब्ध कराई जाये तो संक्रामण को कुछ हद तक रोका जा सकता है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक तरफ पूरे भारत में अनलॉक-1 के पश्चात सभी कार्य सुचारू रूप से चलने लगे है और लोग रोजमर्रा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए बाजार एवम अपने अपने कार्यो की तरफ रुख करने लगे है। हाल ही में भारत मे कोरोनो वायरस की रोकथाम के लिए लगाए गए लॉकडाउन के निर्णय से जहाँ कोरोना संक्रमण के मामले बहुत धीमी गति से बढ़ रहे थे। वही श्रमिकों व मजदूरों के गैर राज्यो से पलायन के कारण अब वही संख्या जनपद में एक विकराल रूप धारण कर लिया है। जनपद बाराबंकी में कोरोनॉ पॉजिटिव की संख्या एक बार तिहाई का आंकड़ा पार कर चुकी है और लोग स्वस्थ भी हो रहे है। जिसके क्रम में खबर लिखे जाने तक पॉजिटिव मामलों की संख्या 58 है और अधिकांश मामले ग्रामीण क्षेत्रो से ही सामने आ रहे है। जिसका प्रमुख कारण है कि मजदूरों का पलायन राज्यो एवम शहरों के गांव की तरफ ही हुआ है, पलायन के बाद अब मजदूर काम की तलाश में शहर की ओर फिर ताक लगाए है और शहरों में आवागमन शुरू हो गया है। जिसके क्रम में आज नाका सतरिख चैराहे पर मजदूरों का हुजूम देखने को मिला, जिनसे बात करने पर जानकारी हुई कि वो सभी काम की तलाश में शहर आये थे किंतु यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि जो मजदूर जनपद में काम तलाशने आते हैं वह पूर्व से ही यहाँ की निवासी है अथवा अन्य जगहों से पलायन कर अपने ग्राम में आये है, जहाँ तक श्रम विभाग का प्रश्न है इस समय इस विभाग को इन परिस्तिथियों को पूर्व से ही भांप कर इन मजदूरों का विवरण दर्ज कर वस्तुस्थिति से अवगत होना अतिआवश्यक प्रतीत होता है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रो से शहर की तरफ आ रहे मजदूरों का विवरण न होने से किसी विषम परिस्थितियों से इनकार नही किया जा सकता है। जैसा कि उपर्युक्त चित्र से ही स्पष्ट है कि मजदूरों में न ही सोशल डिस्टेंसिंग की समझ है और न ही अधिकांश मजदूरों ने अपने चेहरे ढक रखे थे जिसके संबंध में बालकराम नामक एक मजदूर से प्रश्न किया गया तो उसने बताया कि साहेब हमरे कोरोना न होई हम लोग तो मजदूरी न मिले से मर जइबे।
जनपद में कई प्रधानों ने तो कागजों पर तो सैकड़ों लोगों को क्वारंटीन दिखाया जबकि वास्तव में किसी भी व्यक्ति को क्वारंटीन नहीं किया है महज सहायता धनराशि हड़पी गई है। प्रधान जी इस महामारी में भी खूब कमाई कर रहे हैं। शासन द्वारा प्रत्येक व्यक्ति के क्वारंटीन के लिए लगभग 2400 रूपया दिया जाता है किन्तु यह रूपया कहा खर्च होता है किसके पास जाता है यह तो प्रधान जी ही जाने। अगर प्रधान जी इसी तरह से कमाई करते रहे तो आने वाले चुनाव में प्रधानी चुनाव में काफी संघर्ष होने की प्रबल संभावना है। क्योंकि गांव के अन्य व्यक्ति भी जान रहे हैं कि प्रधान जी इस कोरोना महामारी में भी नई-नई गाड़ी व धड़ाधक सरकारी धन का बंदरबांट कर रहे हैं। कई प्रधानों ने तो अपनी आय को छिपाने के लिए घर के लोगों के नाम चल व अचल सम्पत्ति का निर्माण कर लिया है।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जनपद में सरकारी धन का बंदरबांट अकेले प्रधान नहीं करते हैं बल्कि ऊपर से लेकर नीचे तक सम्बंधित अधिकारी भी करते हैं, प्रधान जी कहना है कि हम लोग मिल बांटकर खाते हैं। इसीलिए कोई कार्यवाही नहीं होती है और कार्यवाही कौन करेगा वह जो खुद कमीशन खाता हो। इस तरह से फैले भ्रष्टाचार के मकड़जाल को तोड़ना आसान नहीं है। जब पूरा का पूरा सिस्टम ही कमीशन खोरी पर खड़ा हो तो आम मजदूर को न्याय कहा मिल सकता है। सरकारी धन जो मजदूरों के लिए शासन द्वारा भेजा जाता है उसकी कमीशन बाजी की जानकारी जनपद से लेकर शासन तक के सभी अधिकारियों को है लेकिन कोई भी कार्यवाही करने से कतराता है। अगर कोई अधिकारी कार्यवाही करता भी है तो उसका डिमोशन तक करवा दिया जाता है। इसी तरह का मामला नगर पंचायत बंकी में अभी कुछ दिन पूर्व आया था जिसमंे एक बाबू ने कमीशन खोरी से इनकार कर दिया तो उसका डिमोशन तक की कार्यवाही कमीशन खोर अधिकारियों द्वारा कर दी गई। आज के समय में ज्यादा ईमानदार व्यक्ति का प्रमोधन नहीं होता है बल्कि डिमोशन होता है।
प्रधान द्वारा किये जा रहे कार्य से सीधा असर मजदूरों के साथ-साथ आम जनता पर भी पड़ रहा है। अब देखना यह है कि श्रम विभाग व प्रधान के द्वारा इन मजदूरों के लिए किस प्रकार योजना बनाकर शासन द्वारा प्रदत्त सुविधाएं इनको मुहैय्या करायी जाएंगी या इसी तरह से प्रधान द्वारा सरकारी धन का बंदरबांट किया जाता रहेगा। यह तो वक्त ही बतायेगा।
-नितेश मिश्रा के साथ अब्दुल मुईद के खास रिपोर्ट

