बगैर मारेफत दीन की इताअत मुमकिन नहीं: मौलाना तस्दीक
नेवाज अंसारी संवाददाता एस0एम0 न्यूज 24 टाइम्स)7268941211
कुरआन और अहले बैत एक दूसरे के मुखालिफ नहीं हो सकते
बाराबंकी। अल्लाह मुहाफिजे कुरआन है। उसी ने कुरआन को उतारा वही हिफाजत करने वाला है। किसी की औकात नहीं जो इसमे कोई रद्दो बदल कर सके। यह बात करबला सिविल लाइन में मज्लिसे बरसी बराए ईसाले सवाब मर्हूमा नाहीद फातिमा को खिताब करते हुए मौलाना तस्दीक हुसैन जैदपुरीने कही। उन्होने यह भी कहा कि बगैर मारेफत दीन की इताअत मुमकिन नहीं। कुरआन और अहले बैत एक दूसरे के मुखालिफ नहीं हो सकते। कुरआन, हदीस और अक्वाले मासूमीन पर अमल करने वाला ही सच्चा शीया है। बे अमल शीया असली शीया नहीं होता। हर शबे जुमा फजीलत वाली शब होती है। आखिर में करबला वालों के मसायब पेश किए जिसे सुनकर सभी रोने लगे। मजलिस से पहले डा. रजा मौरान्वी ने पढ़ा-रऊनतों की पनाह गाहें रईसजादे बने हुए हैं, रजा जो उसमें शरीफ जादों को देखता हूँ तो सोंचता हूँ। कशिश सन्डीलवी ने पढ़ा-जिक्रे सरवर न हो ऐसा मुमकिन ही नहीं,फूल की खुशबू कैसे छिपा ली जाये। अजमल किन्तूरी ने पढ़ा-ये हकीकत है के रूहे मारेफत जब तक न हो, इल्म के अफलाक पर भी आदमी बेजान है। मुहिब रिजवी ने पढ़ा-जितना मुहिब दुनियां की हवस को दिल से लगाओगे, नफ्स के सीने पर ये उतना चढ़ती जाएगी। दुनियां समंदर के उस खारे पानी जैसी है, जितना पियोगे प्यास भी उतनी बढती जाएगी। बाकर नकवी ने पढ़ा-अपने ओंठों पे अगर प्यास का दरिया रखना, जेहेन में असगरे मासूम का चेहरा रखना। इसके आलावा फराज व रजा मेहदी ने भी नजरानए अकीदत पेश किया। मजलिस का आगाज तिलावते कलाम ए इलाही से मौलाना हिलाल अब्बास ने किया।बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया।
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