यमन पर सैन्य हमले का मुख्य ज़िम्मेदार कौन है? सामने आ रहा है इमारात का नाम …
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संयुक्त अरब इमारात ने यमन से अपने सैनिकों को बाहर निकालने की जो घोषणा की है उससे यह महसूस होने लगा है कि जब भी इस देश को ख़तरे का आभास होता है, वह धोखा देने की नीति अपनाता है।
संयुक्त अरब इमारात की सरकारी समाचार एजेंसी ने बताया है कि अदन में अलगाववादियों के मज़बूत होने के बाद इमारात के सैनिक, यमन से वापस आ गए हैं। इससे दो दिन पहले इमारात समर्थित बलों ने यमन के भगोड़े राष्ट्रपति मंसूर हादी के बलों को अदन में घुसने से रोक दिया था और मंसूर हादी की सरकार पर आरोप लगाया था कि उसने अलगाववादी बलों की मदद से रियाज़ समझौते को विफल बना दिया है। इसके बाद मंसूर हादी की सरकार के परिवहन मंत्री सालेह जबवानी ने ट्वीट किया था कि संयुक्त अरब इमारात और उसके समर्थन वाले सैनिकों ने रियाज़ समझौते का उल्लंघन किया है और इसे हम बार बार कह चुके हैं।
संयुक्त अरब इमारात और सऊदी अरब ने 26 मार्च सन 2015 को कथित अरब गठजोड़ बना कर और मंसूर हादी को सत्ता में वापस पहुंचाने के बहाने, यमन पर सैन्य हमले शुरू कर दिए थे। समय बीतने के बाद यह बात स्पष्ट हो गई कि मंसूर हादी का नाम यमन में सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात के लोभ के लिए केवल एक चारे के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। इन दोनों देशों के बीच लाभों के बंटवारे को लेकर लोभ और मतभेद उस समय अधिक स्पष्ट हो गया जब अंसारुल्लाह संगठन के नेतृत्व में यमनी बलों व जनता के प्रतिरोध ने उत्तरी यमन में सऊदी अरब को उसके लक्ष्यों में कामयाब नहीं होने दिया जबकि दक्षिणी यमन में संयुक्त अरब इमारात स्थानीय पिट्ठुओं के सहारे कुछ स्थान बनाने में सफल हो गया। पिछले एक साल के दौरान जब जब इमारात को यह एहसास हुआ कि वह अंसारुल्लाह के मीज़ाइलों का निशाना बन सकता है तो उसने घोषणा कर दी कि वह यमन से अपने सैनिकों को बाहर निकाल लेगा लेकिन हर बार उसने वादे के ख़िलाफ़ दक्षिणी यमन में अपने स्थानीय पिट्ठुओं को मज़बूत बनाने की कोशिश की।
ऐसा प्रतीत होता है कि इमारात की सरकार इस समय भी यमन से अपने सैनिकों को निकालने की जो बात कर रही है, वह ढकोसले के अलावा कुछ नहीं है और वह अब भी दक्षिणी यमन में हस्तक्षेप और अबू धाबी समर्थित अर्ध सैनिकों को मज़बूत कर रही है। यमन से अपने सैनिकों को निकालने के इमारात के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसी तरह इस देश के विदेश राज्य मंत्री अनवर क़रक़ाश का यह दावा भी हास्यास्पद है कि यमन में ईरान के प्रभाव को रोकने के लिए इस देश में जारी जंग में इमारात शामिल हुआ था क्योंकि यमन पर सैन्य हमले के मुख्य योजनाकारों में इमारात के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन ज़ायद भी शामिल हैं।
यमन का बंटवारा, उन विषयों में से एक है जिन्हें फ़िलिस्तीन समस्या को भुलाने के लिए सेंचुरी डील के परिप्रक्ष्य में दृष्टिगत रखा गया है। इसे लागू करने की ज़िम्मेदारी संयुक्त अरब इमारात को सौंपी गई है और इस समय कुछ ऐसे इशारे मिल रहे हैं जिनसे पता चलता है कि इस देश ने यमनी राष्ट्र के ख़िलाफ़ अपने इस प्रकार के भयानक व ख़तरनाक षड्यंत्रों को नहीं छोड़ा है। इमारात की सरकार ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया है कि उसके सैनिक अपना अभियान, उन यमनी सैनिकों को सौंपेंगे जिन्हें उन्होंने ख़ुद ट्रेनिंग दी है और उनकी संख्या दो लाख के क़रीब है।
इस बात में कोई शक नहीं है कि दो लाख की सेना का ख़र्च उठाना, उसे सशस्त्र करना और ट्रेनिंग देना, इमारात के ज़िम्मे है और इसका मतलब यही है कि वह अब भी यमन में युद्ध भड़काने का काम जारी रखे हुए है बस अंतर यह है कि इस बार उसने यमनी बलों के हमलों से सुरक्षित रहने के लिए अपना काम अपने यमनी पिट्ठुओं के हवाले कर दिया है। लेकिन संयुक्त अरब इमारात और सऊदी अरब दोनों को यह बात याद रखनी चाहिए कि उन्हें यमन पर अपनी सैन्य चढ़ाई और जघन्य अपराधों का जवाब ज़रूर देना होगा (

