मसौली स्टॉक। खजूरी क्षेत्र के ग्राम गोपालपुर में चल रही सप्तशती भागवत कथा में कथा व्यास चन्द्रशेखर जी महाराज ने कथा के दूसरे दिन बताया कि गुरु के बिना हम जीवन का सार ही नहीं समझ सकते हैं। लेकिन हमेशा इस बात पर हमेशा ही ध्यान देना चाहिए कि गुरु के साथ बातचीत नहीं करनी चाहिए और हमेशा ही अल्पवासी रहना चाहिए। बाकी सभी को एक ही चीज की जरूरत है और बाकी है गुरु की वाणी का श्रवण उन्होंने कहा कि गुरु स्टेज की सेवा का अवसर परम सौभाग्य होता है, जो अनमोल है। मुझे भी ठाकुरजी की कृपा से गुरुसेवा का दायित्व मिला था लेकिन उस समय सेवाभाव का ज्ञान नहीं था और अब जब ज्ञान प्राप्त हो गया तो गुरुसेवा का अवसर नहीं है। इसलिए गुरु सेवा को समर्पित भाव से करना और उनके आदेश का पालन सदा ही करना चाहिए। गुरु की महिमा अपार है और उनकी करुणा अद्भुत है, कब किसकी कृपा हो सकती है। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों में अवतारों के बारे में बताया है कि 24 जगह पर दसावतार की कथा बताई गई है लेकिन अवतारों की संख्या की गणना संभव नहीं है, क्योंकि अवतारों के अनुयायी ही अवतार होते हैं। प्रभु के अवतारों में यह भी कहा गया है कि यहां कोई राक्षस है। दानव और अधर्मी का वध करने के लिए अवतार नहीं होता बल्कि अपने भक्तों पर कृपा बरसाने आते हैं। रावण.कंस को मारने के लिए भगवान का अवतार लेने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने कहा कि घर वापसी वन में चले जाना ही वैराग्य नहीं होता, बल्कि अपने अंतःकरण में सौरमंडल का नितांत आवश्यक है। हमारे जीवन में उपदेश का प्रस्ताव रोम-रोम से होता है, इसके लिए सिर्फ नाक, कान और आँखें ही नहीं होती हैं। संत महात्मा के दिव्य दर्शन के बारे में उन्होंने कहा कि संतो के सत्संग में यह नहीं बताया जाना चाहिए कि हमें कोई बीमारी नहीं है। नहीं रहेगा, हमारा परिवार खुशहाल रहेगा या फिर हमारा व्यापार अच्छा चलेगा, यह तो प्रारब्ध होता है जो इस दुनिया में आया है उसे एक दिन जाना ही है जब लाभ होता है तो नुकसान भी निश्चित होता है। सत्संग तो जीवन की धारा बदल देता है जिसमें आपका ज्ञान और भक्ति की धारा शामिल हो जाती है, लेकिन यहां पर भी अगर कई बार लोग सत्संग करते हैं लेकिन उसका मूल समझ नहीं आता है, जिससे जीवन पर्यन्त सत्संग करने के बाद भी अंत में कुछ भी हासिल नहीं होता. कथा के दूसरे दिन बड़ी संख्या में राक्षस मौजूद थे।
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