ट्रम्प ने कोरोना पर नहीं लेकिन कोरोना ने ट्रम्प पर ज़रूर क़ाबू पा लिया!
समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प अब कोरोना वायरस की महामारी पर क़ाबू पाने से ज़्यादा इस संकट में घिरकर और उलझ कर रह गए हैं। ट्रम्प आने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए जब भी कोई मुद्दा तैयार करने की कोशिश करते हैं कोरोना संकट उस मुद्दे की हवा निकाल देता है।
फ़्रांसीसी अख़बार लोमोंद में एक लेख में कहा गया है कि ट्रम्प के पास अब बीते दिनों को याद करने और दुखड़ा रोने के अलावा कुछ नहीं रह गया है। वह प्रेस कान्फ़्रेन्सों में बस यही कहते सुनाई देते हैं कि हमारे पास दुनिया की सबसे मज़बूत इकानोमी थी। हमारी परफ़ार्मेन्स चीन और दुनिया के हर देश से बेहतर थी। हमारे पास सबसे बड़ा बाज़ार था।
दो महीना पहले ट्रम्प सकारात्मक ख़बरें और मुद्दे जमा करने लगे थे क्योंकि रिपब्लिकन्स ने उन्हें सेनेट में महाभियोग के अभियान से निजात दिला दी थी जो डेमोक्रेटों ने पूरी ताक़त से ट्रम्प के ख़िलाफ़ शुरू किया था। आर्थिक मंच पर अच्छे इंडीकेटर थे और ट्रम्प इसकी मदद से चुनावी फ़सल काटने की तैयारी में थे। मगर अचानक कोविड-19 ने आकर मेज़ उलट दी।
अब ट्रम्प को नज़र आने लगा है कि एक महीने के भीतर बेरोज़गारी की दर आसमान पर पहुंच गई है जिसका मतलब यह है कि ट्रम्प अपने सबसे मज़बूत चुनावी मुद्दे से वंचित हो गए हैं। अब इसी बौखलाहट में ट्रम्प ने विदेशियों के अमरीका आने पर रोक लगा दी। यह इकानोमी को पुनः खोलने की उनकी योजना के ख़िलाफ़ फ़ैसला है। इकानोमी को रफ़तार देने के लिए कामगारों की ज़रूरत पड़ेगी जिनमें विदेशी कामगार भी शामिल हैं।
ट्रम्प की कोशिश थी कि देश की इकानोमी को बंद न करना पड़े लेकिन आख़िर में वह मजबूर हो गए क्योंकि कोरोना ने बहुत बड़े पैमाने पर नुक़सान पहुंचाना शुरू कर दिया। कुछ टीकाकार तो कहने लगे हैं कि संक्रामक रोग विशेषज्ञ एंथनी फ़ाउची ने वह काम कर दिखाया जो ट्रम्प के सलाहकार नहीं कर पा रहे थे। ट्रम्प के सलाहकारों को शिकायत थी कि ट्रम्प कोई भी सलाह मानने के लिए तैयार नहीं होते मगर फ़ाउची के सामने ट्रम्प हथियार डाल देने पर मजबूर हो गए।
ट्रम्प अपनी प्रेस ब्रीफ़िंग में हर दिन अलग राग लेकर आते हैं। कभी वह कहते हैं कि रिपब्लिकन, डेमोक्रेट, लिबरल और कंज़रवेटिव सब एक हैं। हम सब से मिलकर हमारा राष्ट्र बना है। हमारी आज की क़ुरबानियों को आने वाली पीढ़ियां याद करेंगी। कभी उनका राग बदल जाता है और वह डेमोक्रोटों के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारियों को उकसाना शुरू कर देते हैं। ट्रम्प अब बलि के बकरे की तलाश में लग गए हैं। इसलिए वह कभी न्यूयार्क के डेमोक्रेट गवर्नर एंड्र्यू कूमो पर झपट पड़ते हैं कभी डब्ल्यूएचओ को निशाना बनाते हैं और कभी चीन को धमकियां देते हैं।
ट्रम्प की हालत अजीब हो गई है वह कभी तो एंथनी फ़ाउची को बर्खास्त करने की मांग करने वाले ट्वीट को रिट्वीट करते हैं और अगले ही दिन कहते हैं कि फ़ाउची को हटाने का उनका कोई इरादा नहीं है। कारण यह है कि सर्वे में यह बात सामने आई है कि अमरीका में लोगों की बड़ी संख्या को फ़ाउची पर बहुत भरोसा है।
चुनाव में ट्रम्प के मुक़ाबले में जो बाइडन हैं जो अपना ख़ास स्वभाव रखते हैं। पोल के नतीजों से पता चलता है कि अमरीकी जनता को संकट को हैंडल करने में बाइडन ज़्यादा सक्षम नज़र आते हैं।
तेल की क़ीमतों का संकट भी सामने आया। ट्रम्प ने सऊदी अरब और रूस के झगड़े में कूद कर कोशिश की कि इस मामले को संभालें ताकि अमरीका की शेल आयल कंपनियों को डूबने से बचा सकें मगर ट्रम्प की कोशिशें नाकाम हो गईं क्योंकि तेल की क़ीमतें तो शून्य से भी नीचे चली गईं।
स्रोतः लोमोंद+अलजज़ीरा

