अपने सैनिकों के युद्ध अपराधों की जांच में प्रगति से सहमा अमरीका, आईसीसी की प्रासिक्यूटर और जजों को वीज़ा देने से इंकार, क्या अमरीकी सैनिकों के जेल की सलाखों के पीछे जाने के दिन क़रीब हैं?
समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ
विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ पर भारी प्रहार करने और लगभग 50 करोड़ डालर की सालाना फंडिंग रोक देने के बाद अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने इंटरनैशनल क्रिमनल कोर्ट के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया और अदालत की प्रासिक्यूटर फ़ातू बेनसोडा और न्यायिक पैनल के सभी सदस्यों पर प्रतिबंध लगा दिया है।
ट्रम्प ने यह क़दम युद्ध अपराध के मामलों में अपने सैनिकों को अदालती कार्यवाही से बचाने के लिए किया है।ट्रम्प के इस फ़ैसले से ज़ाहिर होता है कि वह बुरी तरह डरे हुए हैं और उन पर आंतरिक और बाहरी स्तर पर भारी दबाव पड़ रहा है। ट्रम्प को यह महसूस होने लगा है कि विश्व समुदाय अब अमरीकी वर्चस्ववाद और दबाव की नीतियों के मुक़ाबले में एकजुट होने लगा है।अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी सैनिकों ने हत्या और उत्पीड़न के बेहद गंभीर अपराध अंजाम दिए हैं, वहां आम नागरिकों पर बमबारी की गई, शादी और शोक समारोहों को निशाना बनाया गया, बेगुनाह नागरिकों को क़त्ल किया गया। इराक़ में भी अमरीकी सैनिकों के अपराधों की सूची बहुत लंबी है। अबू ग़ुरैब जेल में क़ैदियों को दी जाने वाली अमानवीय यातनाएं सबके सामने हैं।
हमें नहीं लगता कि ट्रम्प की ओर से लगाए गए प्रतिबंधों का इंटरनैशनल क्रिमनल कोर्ट के अधिकारियों पर कोई ख़ास असर होगा। ट्रम्प ज़्यादा से ज़्यादा यही कर सकते हैं कि उन्हें अमरीका की यात्रा करने से रोक दें और यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं है कि कोर्ट के जजों, वकीलों और अधिकारियों की चैन की नींद छीन ले। अमरीका धरती का स्वर्ग तो है नहीं। ट्रम्प के इस क़दम से वैश्विक अदालत का संकल्प और भी मज़बूत होगा और वह अमरीकी अपराधों की और अधिक तनमयता से जांच करेगी।अमरीकी सरकार इस प्रकार के प्रतिबंध लगाकर अंतर्राष्ट्रीय क़ानूनों का हनन करने के साथ ही मानवाधिकारों के हनन की प्रक्रिया को सुरक्षित रास्ता दिखा रही है। जबकि अमरीका का विदेश मंत्रालय हर साल लंबी लंबी सूची प्रकाशित करके दुनिया के देशों को मानवाधिकार पर उपदेश देता रहता है।
हम फ़ातू बेनसोडा को सलाम करते हैं कि वह अमरीका की धमकिकों से डरीं नहीं बल्कि अपने मिशन पर काम करती रहीं और अमरीकी युद्ध अपराधियों के खिलाफ़ उनकी जांच जारी रही। उन्होंने एलान किया कि उनके पास इस बात के ठोस सुबूत मौजूद हैं कि सन 2003 और 2004 में अमरीकी सैनिकों ने अफ़ग़ानिस्तान में मानवाधिकारों का हनन किया, यातनाएं दीं, यौन उत्पीड़न किया।माइक पोम्पेयो की ओर से बेनसोडा और उनकी टीम के लोगों को अमरीका का वीज़ा देने से इंकार उनके लिए गर्व की बात है और उनके साहस और स्वाधीनता का सुबूत भी है।
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