कृषि संशोधन कानून, किसानों के हितों में नही: मनोज सिंह
मोहम्मद अतीक संवाददाता थाना क्षेत्र असंद्रा एसएम न्यूज़24टाइम्स
बाराबंकी। केन्द्र सरकार द्वारा संसद में लाये गये कृषि संशोधन कानूनश् किसानों के अनुसार उनके हितों में नही है, इस कानून के पास होने से किसानों को पूँजीपतियों का गुलाम बनाये जाने की साजिश की गयी है। जनसत्ता दल लोकतान्त्रिक पार्टी के प्रधान महासचिव अधिवक्ता मनोज सिंह ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा संसद में लाया गया कृषि संशोधन कानून किसानो के अनुसार उनके हितों में नही है इस कानून को पास कराकर किसानों को पूँजीपतियों का गुलाम बनाये जाने की साजिश की गयी । ऐसे में जब पूरे देश अन्नदाता इस कानून के विरोध में सड़को पर आन्दोलित है तो सरकार को आगे बढ़कर सभी किसान नेताओ से वार्ता कर उनकी शंकाओं को निस्तारित कर उनकी जायज मांगो को मानना चाहिये। यह आंदोलन लोगो उन से जुड़ा हुआ है जो धरती का सीना चीर कर अनाज उगाते हैं और सभी का पेट भरते है, मौजूदा धान की फसल को किसान आज 900 से 950 रुपये प्रति कुंटल बेचने को मजबूर है जो उसकी लागत का 75 प्रतिशत भी नहीं है। पंजाब से लेकर हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना देश के लगभग हर राज्य के किसान दिल्ली के चारों ओर इस कड़ाके की ठंड में अपनी जान जोखिम में डाले हुए धरने पर बैठे हुए हैं और केन्द्र सरकार सत्ता के नशे में किसानों के इस आंदोलन की अनदेखी कर रही है,अब तक 3 किसानों की इस आंदोलन में शहादत हो चुकी है परंतु किसानों का मनोबल किसी भी प्रकार से नहीं गिरा है, यदि सरकार किसानों के मुताबिक बात को नहीं मानती है तो किसानों का आंदोलन और व्यापक होगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह जनतांत्रिक व्यवस्थाओं के अनुसार किसानों से वार्ता कर उनकी मांगों को गंभीरता पूर्वक सुने क्यूकि यदि यह कानून किसानों के हितों के लिये लाया गया है तो सरकार किसानों की बात को क्यू नही सुन रही है ,जिससे लगता है कि जरूर इसमे सरकार की मंशा किसानों के हित में नही है सरकार को चाहिये कि वह तानाशाही से बाज आकर किसानों से बातकर उनकी शंकाओं को दूर करना चाहिये तभी इसे किसान हितैशी कानून कहा जा सकता है। सरकार को यह मालूम होना चाहिए की किसान फसल उगाना जानता है तो फसल काटना भी उसे आता है, यदि किसान सरकार बना सकता है तो उसे हटा भी सकता है। विगत 70 वर्षों के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि देश का अन्नदाता अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है और सरकार को कोई फर्क नही पड़ रहा है, किसी सरकार का पूंजी पतियों पर निर्भर होना प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत का मखौल है। सरकार को इस बारे में सोचना होगा कि किसानों ने तो अपनी बात रख दी है कि किसी भी मायने में यह किसान विरोधी कानून हमें मंजूर नहीं, इसके लिए हम यहां से हटने वाले नहीं, हम डटे रहेंगे आखिर क्या वजह है जो सरकार तानाशाही रवैया अपनाए हुए हैं आखिर क्यों ? और क्या नुकसान है सरकार को किसानों से बात कर उनकी शंकाओं को दूर कर उनकी जायज मांगो को मानने में यदि वास्तव में सरकार किसानों का हित चाहती है। सरकार को नफरत की राजनीति बंद करके देश की एकता अखंडता के प्रति गंभीरता पूर्वक काम करना चाहिए।
मोहम्मद अतीक संवाददाता थाना क्षेत्र असंद्रा एसएम न्यूज़24टाइम्स

