अतीत में हुए दंगों की टीस अभी बाक़ी है, दिल्ली की हिंसा से ताज़ा हो गईं पुरानी यादें!
समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ
दिल्ली एक बार फिर जल उठी है तो इस शहर ही नहीं पूरे देश की याद्दाश्त में मौजूद भयानक दंगों की याद ताज़ा हो गई है।
महाराष्ट्र में सत्ताधारी शिव सेना ने कहा है कि दिल्ली की हिंसा सिख विरोधी दंगों के समान है और भाजपा अगर सिख विरोधी दंगों का बार बार विरोध करती है और कांग्रेस पर आरोप लगाती है तो अब वह दिल्ली हिंसा को रोकने के लिए प्रभावी क़दम क्यों नहीं उठाती।
दूसरी ओर ओर दिल्ली हाई कोर्ट के बयान से भी ज़ाहिर हो गया कि अतीत में हुए दंगों की गहरी टीस हर जगह मौजूद है।

भाजपा नेता कपिल मिश्रा और अन्य लोगों के नफरत फैलाने वाले भाषणों के वीडियो नहीं देखने वाली पुलिस की टिप्पणी पर दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालत में वीडियो को देखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि हमें यकीन है कि पुलिस आयुक्त के कार्यालय में एक टीवी है। कृपया उनसे इस क्लिप को देखने के लिए कहें। बीते रविवार से दिल्ली में जारी हिंसा को बहुत दुखद बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह राजधानी में एक और 1984 दंगा नहीं होने दे सकता है और राज्य के शीर्ष अधिकारियों को बहुत अलर्ट रहने की आवश्यकता है।
भारतीय मीडिया के अनुसार हाईकोर्ट ने दिल्ली में जारी हिंसा में एक आईबी कर्मचारी की हत्या को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। जस्टिस एस. मुरलीधर ने कहा, ‘अब यह दिखाने का समय आ गया है कि हर किसी के लिए जेड श्रेणी की सुरक्षा है। इससे पहले दिन में अदालत ने कहा था कि वह ‘मामलों की स्थिति पर आश्चर्यचकित’ थी क्योंकि दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसने अभी तक भाजपा नेता कपिल मिश्रा और अन्य लोगों के नफरत फैलाने वाले भाषणों के वीडियो नहीं देखे हैं जिन्होंने कथित तौर पर नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भीड़ को हमले के लिए उकसाया।इसके साथ ही पीठ ने मेहता से कहा कि वे भाजपा नेताओं अनुराग ठाकुर, परवेश साहिब सिंह और कपिल मिश्रा पर कथित तौर पर घृणा फैलाने वाले भाषणों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के लिए पुलिस आयुक्त अमूल्य पटनायक को सलाह दें। हाईकोर्ट ने पूछा कि क्या तीन में से किसी नेता ने कथित आपत्तिजनक बयान से इनकार किया है; याचिकाकर्ता के वकील ने कहा नहीं, वे इसमें गर्व महसूस करते हैं।
नेताओं के साथ ही पुलिस के रवैए पर सवाल उठ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाकों में हो रही बर्बर हिंसा को लेकर बुधवार को महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की। शाहीन बाग में रोड खाली कराने की मांग वाली याचिका के साथ दिल्ली हिंसा पर कोर्ट की अगुवाई में जांच की मांग वाले आवेदन पर सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ ने हिंसा पर गहरी चिंता व्यक्त की है। जस्टिस कौल ने कहा, ‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि ये सब हुआ है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘पुलिस की निष्क्रियता को लेकर मैं कुछ कहना चाहता हूं। अगर मैं ऐसा नहीं करता हूं तो ये मेरे कर्तव्य के साथ न्याय नहीं होगा। इस देश के प्रति, इस संस्थान के प्रति मेरी निष्ठा है।
लेकिन जस्टिस जोसेफ ने अपनी बात जारी रखी और कहा, ‘समस्या ये है कि पुलिस में स्वतंत्रता और दक्षता या पेशेवर अंदाज की कमी है। अगर ये पहले कर लिया गया होता तो ऐसी स्थिति न खड़ी होती।
यही बिंदु सबसे महत्वपूर्ण है कि अगर समाज के ज़िम्मेदार लोग और विभाग अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करें और उस पर अमल करें तो हालात या तो बेक़ाबू नहीं होंगे और अगर हुए तो जल्द क़ाबू में आ जाएंगे। इस प्रकार के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं जिनमें पुलिस कर्मी दंगाइयों का साथ देते दिखाई दे रहे हैं। वैसे इन वीडियोज़ की जांच की जानी शेष है। यह समझना ज़रूरी है कि अगर पुलिस विभाग जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएं दायित्वहीनता दिखाएंगी तो इसके बहुत बुरे परिणाम होंगे।

