कोरोना पीड़ित की आपबीती ने खोली सरकार और प्रशासन की पोल भारी अव्यवस्थाओं के बाद भी जंग जीत रहे कोरोना संक्रमित मरीज

शमीम अंसारी बाराबंकी: एसएम न्यूज24टाइम्स .


बाराबंकी। कोरोना वायरस से दुनिया भर में अब तक लाखों लोग संक्रमित हो चुके हैं। इस दौरान कई लोग वायरस से उबकर स्वस्थ हो गए हैं। वहीं बड़ी तादाद अब भी इससे जूझ रही है। ऐसे में कई कोरोना पॉजिटिव पाए गए मरीजों का मनोबल न टूटे इसलिए एक मरीज ने अपने अनुभवों को साझा किया है। जनपद में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों को चंद्रा अस्पताल में भर्ती किया जाता है। यह अस्पताल एल 1 श्रेणी की सुविधा का अस्पताल है। चंद्रा हॉस्पिटल में भर्ती कोरोना संक्रमित मरीज पाटेश्वरी प्रसाद जोकि पेशे से पत्रकार है, उनसे जब हमारे संवाददाता ने बात की तो उन्होंने अपनी आपबीती बताई। उन्होंने कोरोना से पीड़ित होने की कहानी और इससे लड़ने के लिए क्या करना है, इसे साझा किया। पाटेश्वरी प्रसाद ने बताया कि मैं जिस प्रोफेशन में हूं, उसमें कई लोगों से संपर्क निरंतर चलता रहता है। बीते 3 अगस्त से मुझे बुखार आया और गले में खराश हुई तो शक हुआ। चेकअप करवाया। इसी बीच मुझे आशंका थी, इसलिए मैंने खुद को घर में आइसोलेट कर लिया। बेटा और पत्नी अलग कमरे में और मैं अलग कमरे में। मैंने चीजें भी अलग यूज करना शुरू कर दिया। गत 9 अगस्त को एंटीजेन टेस्ट की रिपोर्ट में कोरोना पॉजिटिव के लक्षण पाए गए। चिकित्सकों की सलाह पर चंद्रा हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। अस्पताल पहुंचने के बाद अब खुद को ठीक फील कर रहा था। लेकिन बुखार उतर नही रहा था। अगले दिन प्रभारी हॉस्पिटल एवं चिकित्सक डॉ पी.के सिंह मेरा हालचाल लेने आए। मैंने अपने बुखार के बारे में बताया तो उन्होंने मुझे कुछ सामान्य दवाएं दी। जब मैंने उन्हें अपनी दवाएं दिखाई तो उन्होंने कहा कि श्यह दवा सबसे बेहतर है। मैंने उनसे अस्पताल में गर्म पानी और साफ पानी न होने की बात कही। उन्होंने कहा कि श्यहां साफ पानी की बड़ी समस्या है। आरओ का पानी उपलब्ध नही हो सकता। बाहर के नल का पानी ही इस्तेमाल करना होगा। और गर्म पानी, काढ़ा, दूध इत्यादि चीजें हमारी गाइड लाइन में नही है। आप सीएमओ साहब से बात कर सकते है। खैर, जब मैंने उनसे कहा कि नल का पानी पीने योग्य नही है। वहां कितनी गंदगी है। बगल में गेट पर पीपीई किट और अन्य गंदगी का जमावड़ा है। ऐसे में कोई बिना संक्रमित हुए कैसे स्वस्थ हो सकता है। तब उन्होंने कहा श्आप इसकी शिकायत प्रशासन से कर सकते है। मैं आपकी कोई मदद नही कर सकता।श् होते करते दोहपर हुई तो खाने का समय हुआ। खाने में दाल, चावल, सब्जी और रोटी थी, सभी अलग अलग पॉलिथीन में रखी थी। पॉलिथीन जोकि पूरे सूबे में प्रतिबंधित है फिर भी यहां के अस्पताल में खुलेआम सप्लाई हो रही है। यह प्रशासन की देख रेख में हो रहा था। जिस पर किसी की नजर नही जा रही थी। यही हाल रात के भोजन का था। अस्पताल में खाना वितरण को लेकर आए दिन मरीजों के बीच आपस में विवाद होता। उसका कारण था अस्पताल प्रबंधन का एक व्यक्ति खाने की सभी थैलियां गेट के पास रखी कुर्सी पर रखकर चला जाता है। फिर सारे कोरोना संक्रमित मरीज खाने की थैलियों पर एक-साथ टूट पड़ते है। ऐसा हर रोज होता है। ऐसे में कोई खाना पाता है तो कोई भूखा ही रह जाता है। मैं भी दो दिन खाने से वंचित रहा। फिर मैंने घर से खाना और गर्म पानी मंगवाना उचित समझा। अस्पताल प्रशासन की बदइंतजामी को देख कोरोना संक्रमण का खतरा और भी बढ़ता जा रहा था। कारण साफ था हर तरफ गंदगी थी। बाथरूम में गंदगी, कूड़ा दान भी गंदा, वार्ड के वाशबेसिन और कमरों में गंदगी का अम्बार इकट्ठा था। वार्ड में बरसात का पानी आने से मच्छरों कर प्रकोप बढ़ रहा था। बाथरूम में भी अंधेरा रहता। लाइट की समुचित व्यवस्था नही थी। जो मरीज अस्पताल भेज गये थे उनमें ज्यादातर बीमार थे। उनके इलाज की कोई व्यवस्था नही। दवाओं का कोई इंतजाम नही। सोशल डिस्टेंसिंग तार तार हो रही थी। जिन मरीजों का खाना घर से आता उन्हें ऐसे समय खाना मिलता जब भूख खत्म हो जाती। ऐसी परिस्थिति कारावास में कैदियों की भी नही होती जैसी कोरोना संक्रमित मरीजों की थी। तमाम शिकायतों के बाद भी प्रशासन के कान में जूँ तक नही रेंग रही थी। सरकार की योजनाओं को प्रभावित करने वाले नौकरशाह मौज कर रहे है। ऐसे में एक बात जो मैंने समझी है वह यह है कि इस वायरस को हराने का एक ही तरीका है कि घर पर रहें, अस्पताल बिल्कुल भी न जाएं। घर पर ही दूरी बनाकर रहिए। एकांतवास में दोस्तों और रिश्तेदारों से फोन ही मुझे हिम्मत दे रहा था। मेरे संक्रमित होने के बाद मेरे परिजनों का भी एंटीजेन टेस्ट हुआ। जिसमें पत्नी, बेटा, बहन, मां और भाई की पत्नी भी संक्रमित आइसोलेट रखा गया। जिसके बाद मेरे घर पर हाल चाल लेने वाला कोई भी नही आता था। ऐसा लगता था जैसे हर किसी में मेरे परिवार से मुँह मोड़ लिया हो। मेरे 10 माह का बेटा है। उसको पीने के लिए दूध आता था वह भी अब बंद हो गया था। घर के ही रहकर वह बीमार और कमजोर हो गया। फिर भी सरकार के सभी निर्देशों का पालन किया गया। जबकि सरकारी मशीनरी पूरी तरह से फेल दिखी। कोविड अस्पताल की यह बदहाल व्यवस्था बदस्तूर जारी है। प्रशासन पूरी तरह से मौन है। ऐसे में संक्रमित मरीजों पर संक्रमण का खतरा गहरा गया है।

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