वाल्दैन (माता-पिता) की एक रात की खिदमट (सेवा) का अज्र (पुण्य) एक हज के बराबर होता है – मौलाना मो0 रज़ा ज़ैदपुरी 

नेवाज अंसारी संवाददाता एस0एम0 न्यूज 24 टाइम्स)

पाक़ीज़ा ज़िन्दगी वाला ही मोमिन होता है

बाराबंकी ।  मौलाना गुलाम अस्करी हाल में  मरहूमा  शहनाज़ बानो  की इसाल ए सवाब की मजलिस को सम्बोधित करते हुए  मौलाना मो0  रज़ा ज़ैदपुरी ने कहा कि वाल्दैन (माता-पिता) की एक रात की खिदमट (सेवा) का अज्र (पुण्य) एक हज के बराबर होता है । समाज से बुराई दूर करने के लिये हमें सिद्धांतो और उसूलों के साथ जिन्दगी का सफर तय करना होगा ।जब इंसान अपने उसूलों से हटता है तो अपना भी नुकसान करता है और समाज को भी नुकसान पहुंचाता है। अहले बैत के  मानने वाले पकीज़ा जिन्दगी बसर करते है।जो पाकीजा जिन्दगी बसर करते हैं वही मोमिन होते हैं ।मोमिन को परवरदिगार रिज़्क ए पाक़ीज़ा अता करता है ।आखिर में  करबला वालों के  मसायब पेश किया जिसे सुनकर सभी रो पड़े।मजलिस से पहले सईद ज़ैदपुरी नेअपना बेहतरीन कलाम पेश करते हुए पढ़ा- जब फ़ातिमा ने खुल्द ए बरी का सफर किया ,सरवरअली कर्बलाई ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा –  छोड़कर दुनियां की लालच राहे हक़ पर चल पड़ो , है सफ़र मुश्किल मगर मंज़िल तो पा ली जाएगी ।शबी अहमद आब्दी ने पढ़ा-ऐ नफ्स ए मुतमइन्ना पलट आ मेरी तरफ़ ,तुझसे ये राज़ी अब तेरा परवर दिगार है ।गाज़ी इमाम,मोहम्मह व मो0 रज़ा ने नज़रानए अक़ीदत पेश किया ।मजलिस का आरम्भ तिलावत ए कलाम से हुआ। बाद ए मजलिस अन्जुमन गुन्चा ए अब्बासिया ने नौहाख्वानी भी की ।बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया ।नेवाज अंसारी संवाददाता एस0एम0 न्यूज 24 टाइम्स)

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