वैज्ञानिकों ने सिम उन्नति में बीज खेती करने का तरीका बताया
संग्राम सिंह रावत संवाददाता ब्लाक सिद्धौर
सिद्धौर, बाराबंकी। सिद्धौर ब्लाक क्षेत्र के कुम्हरावां गांव में सीमैप पंतनगर की तीन सदस्यीय वैज्ञानिकों की टीम ने नई सिम उन्नति प्रजाति की मेंथा फसल की जड़ों का निरीक्षण किया। टीम ने क्षेत्रीय किसानों सी मैप से जुड़कर नई-नई तकनीकी विधियों से खेती करने तरीका सीखने अपील की। जिसके लिए संगोष्ठी में उन्होंने 15 दिवसीय किसान मेला के बारे में भी उल्लेख किया। कार्यक्रम का संचालन प्रगतिशील किसान व पूर्व चेयरमैन सहकारी बैंक रामनाथ वर्मा ने किया। सिद्धौर ब्लॉक क्षेत्र के कुम्हरावां गांव निवासी प्रगतिशील किसान कमल सिंह पटेल के द्वारा इसी वर्ष 7 फरवरी 2020 को उत्तराखंड प्रांत के केंद्रीय औषधीय व सगंध पौध संस्थान से मेंथा किसान के रूप में चयन किया गया। जिससे संस्थान ने उन्हें मेंथा फसल की नई प्रजाति सिम उन्नति में बीज खेती करने का तरीका बताया। प्रगतिशील किसान के द्वारा बीते वर्ष मेंथा फसल में अच्छी पैदावार कर संस्थान के विशेषज्ञों को प्रमाण दिया। जिससे संस्थान के तीन सदस्यीय वैज्ञानिकों डॉ संजय कुमार डॉक्टर ऋषिकेश व डॉक्टर की टीम शुक्रवार को गांव पहुंचकर उनकी मेंथा फसल की जानकारी लेते हुए किसानों के लिए गोष्ठी का आयोजन किया। जिसमे संस्थान के वैज्ञानिक डॉ संजय कुमार, डॉक्टर बीआर सिंह व ऋषिकेश सिम उन्नत प्रजाति की खूबियां गिनाई। जिसमें वैज्ञानिक डॉ संजय कुमार ने बताया कि उत्तर प्रदेश में करीब 70 दशक के बाद मेंथा की खेती प्रदेश के सुल्तानपुरी इलाके में हुई। जहां पर रिचर्ड्सन कंपनी के द्वारा तेल उत्पादन किया गया। किसानों की डिमांड पर मेंथा कई प्रजातियां विकसित हुई। वैज्ञानिक डॉ संजय कुमार ने बताया कि अनुसंधान केंद्र से प्रमाणित मेंथा आयल की किस्मों में कोषी, क्रांति, सरयू व सिम उन्नति प्रमुख है। जिसमें कोसी व सिम उन्नति नई प्रजाति है। सिम उन्नत नई प्रजाति में तेल की अधिक मात्रा होने के साथ-साथ मेंथा आयल्स से अधिक पाया जाता है। उन्होंने बताया कि किसानों को मेड विधि से मेंथा आयल की खेती करने से पानी की कम आवश्यकता होती है। साथ खाद की डिमांड भी कम रहती है। जिसमे सिम उन्नति प्रजाति को तेल उत्पादन में अन्य प्रजातियों से अधिक बेहतर बताएं। डॉ ऋषिकेश ने किसानों को संगोष्ठी में मेंथा आयल के वेस्ट मटेरियल से केंचुए की खाद बनाए। जो फसलों को उपयोगी होने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता में भी बदलाव आता है। फसलों के लिए रासायनिक उर्वरकों की कम इस्तेमाल करने पर किसान के लिए लाभदायक है।
संग्राम सिंह रावत संवाददाता ब्लाक सिद्धौर

