विलादत ए बा सआदत मरकज ए दायर ए इसमत, दुख़तरे रसूल, जौज़ए अली,मादरे हसनैन करीमैन के मौके पर हुआ जश्ने नूर
बाराबंकी । मौलाना गुलाम अस्करी हाल में हुआ जश्ने नूर । मरकज ए दायर ए इसमत, दुख़तरे रसूल, जौज़ए अली,मादरे हसनैन करीमैन,मादरे जै़नब ओ कुल्सूम,उम्मुल आइम्मा, सय्यदा निसाइल आलमीन, कनीज़ ए ख़ास ख़ुदा,मासूमये कुबरा ,सिद्दीक़ा ए ताहेरा,मरज़ीया अल ज़कीय्या वल ताहिरा, बुतूल व तफ़्सीरे सूरये कौसर की विलादत ब सआदत के मौके परमहफ़िल को खि़ताब करते हुए आली जनाब मौलाना सै.नक़ी अस्करी साहब क़िबला ने कहा ऐसे लोगों के नक्शे कदम पर न चलें कि इस्लाम रुख़्सत हो जाए ।अल्लाह ने अहले बैते नबी से नजासत को हमेशा के लिए दूर रखा।जो ख़ुद को औलाद ए ज़हरा या कनीज़ ए ज़हरा कहते या समझते हैं उन्हें चाहिए कि खुली गुमरही से बचे ,अपने किरदार को दाग़दार न बनाएं ,वरना दोगुना अज़ाब के लिए तैयार रहे । बतुफैल आले मोहम्मद सभी के लिए दुआ की ।खिताबत से पहले शोअरा ने अपने कलाम पेश किए डा.रज़ा मौरान्वी ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा-अपने ओंठों पे सना तेरी सजाने के लिए, सूरे क़ुरआं के पुकारा किये ज़हरा ज़हरा। अजमल किन्तूरी ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा-इस लिए हर लब्ज़ मिदहत का अज़ीमुश्शान है ,फ़ातिमा ज़हरा मेरी तहरीर का उनवान है। डा.मुहिब रिज़वी ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा-तेरी महफ़िल में अगर रात बसर हो जाए, ज़ुल्मते शामे तख़य्युलकी सहर हो जाए ।आरिज़ जरगांवीं ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा- आमद जनाबे फ़ातिमा ज़हरा हुई की बस,हर दुश्मने नबी का जनाज़ा निकल गया।आरिज़ ज़रा बिलाल की ख़ुशियाँ तो देखिये, क्या बात है अज़ान का लहजा बदल गया। हाजी सरवर अली करबलाई ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा-बिन्ते रसूल हमसरे हैदर है फा़तिमा, अज़मत में मुर्तुज़ा के बराबर है फ़ातिमा ।इसके अलावा अज़हर,जाकिर इमाम, ज़ईम क़ाज़मी,मो.तकी व सादिक हुसैनने भी नज़रानये अकी़दत पेश किया।महफिल का आग़ाज तिलावत ए कलाम ए पाक से सादिक हुसैन ने किया।बानिये महफिल ने सभी का शुक़्रिया अदा किया।
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