रूस के ख़िलाफ़ सऊदी अरब के तेल युद्ध में छलांग लगा रहा है इमारात क्या इसका नतीजा यमन युद्ध से अलग होगा? क्या सऊदी अरब में राजकुमारों की धरपकड़ कठोर आर्थिक नीतियों की भूमिका है?
समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ
यमन युद्ध अपने छठें साल में प्रवेश कर रहा है तो यह युद्ध थोपने वाले सऊदी अरब और इमारात ने एक और लड़ाई शुरू कर दी है जो यमन युद्ध से कम भयानक नहीं है। यह युद्ध रूस पर और शेल आयल पैदा करने वाले देशों पर गहरा आघात लगाने के लिए है। इस युद्ध के नतीजे में दुनिया भर में तेल की क़ीमतें बुरी तरह प्रभावित हुई हैं।
सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने इस युद्ध की आग भड़काई बिल्कुल उसी तरह जैसे उन्होंने यमन पर अचानक बमबारी शुरू कर दी थी। बिन सलमान ने अतिरिक्त दो मिलियन बैरल तेल के उत्पादन का फ़ैसला कर लिया और तेल की क़ीमत प्रति बैरल दस डालर कम कर दी ताकि तेल बाज़ार में वह अधिक से अधिक हिस्सा अपने हाथ में ले सकें। इमारात भी सऊदी अरब के रास्ते पर चल पड़ा और उसने 3 मिलियन बैरल तेल का उत्पादन बढ़ाकर चार मिलियन बैरल कर दिया। इस तरह इमारात इस युद्ध में सऊदी अरब के साथ जा खड़ा हुआ है।
सऊदी अरब चाहता है कि अपने आकस्मिक हमले से रूस और शेल आयल पैदा करने वाले देशों को अपनी शर्तें मानने पर मजबूर करे। सऊदी अरब ने अमरीका के कहने पर वर्ष 2014 में भी यही काम किया था नतीजतन तेल के बाज़ार में तेल की सप्लाई बहुत ज़्यादा हो गई थी और डिमांड कम थी। उस समय ईरान और रूस की अर्थ व्यवस्थाओं की कमर तोड़ना मक़सद था मगर ईरान और रूस दोनों ने उस स्थिति का सफलता के साथ सामना किया जबकि तेल की क़ीमत गिरने से सऊदी अरब को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ गया था।
इस बार सऊदी अरब और इमारात ने जो लड़ाई छेड़ी है उसका नतीजा क्या होगा इस बारे में अभी कुछ कहना कठिन है क्योंकि अभी इस लड़ाई को दो तीन ही दिन हुए हैं लेकिन रूसी राष्ट्रपति पुतीन का यह कहना कि वह तेल की वर्तमान क़ीमत यानी 30 डालर प्रति बैरल के साथ आने वाले दस साल भी गुज़ार सकते हैं, यह बताता है कि रूस ने ओपेक से कोई भी समन्वय न रखने की रणनीति बहुत सोच समझ कर तय की है और हालात के लिए कई महीने पहले तैयारी पूरी की जा चुकी है। वैसे भी रूस की अर्थ व्यवस्था में केवल 16 प्रतिशत भाग तेल की आमदनी पर निर्भर है। जबकि सऊदी अरब की अर्थ व्यवस्था तो 90 प्रतिशत तक तेल की आमदनी पर टिकी हुई है।
इस लड़ाई का सबसे ज़्यादा नुक़सान ओपेक को होगा और सऊदी अरब की जनता को कठनाइयां झेलनी होंगी क्योंकि अब बहुत कठोर आर्थिक नीतियां लागू की जाएंगी जैसा 2014 में किया गया था।
जारी वर्ष में सऊदी अरब का बजट 272 अरब डालर है जो इस देश के इतिहास का सबसे बड़ा बजट है। इसे तेल की क़ीमत को 50 से 60 डालर प्रति बैरल के पूर्वानुमान के साथ तैयार किया गया था। बजट घाटा पूरा करने के लिए सऊदी अरब के लिए ज़रूरी है कि उसका तेल 80 डालर प्रति बैरल के रेट से बिके मगर हालात यह हो गए हैं कि तेल की क़ीमत तो 25 डालर प्रति बैरल से भी नीचे जाने वाली है। यानी सऊदी अरब का बजट घाटा 130 अरब डालर तक पहुंच सकता है।
बिन सलमान ने शुक्रवार को पूर्व क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान और अपने चाचा अहमद बिन अब्दुल अज़ीज़ सहित बीस से अधिक राजकुमारों को गिरफ़तार किया था तो इसका उद्देश्य यह था कि देश में कठोर आर्थिक नीति आराम से लागू करें और कोई उनका विरोध न कर सके।
रायटर्ज़ ने कम से कम चार जानकार सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि सऊदी अरब ने सरकारी संस्थाओं से कहा है कि वह बजट में कम से कम बीस प्रतिशत की कटौती के उपाय और प्रस्ताव तैयार करें।
मुहम्मद बिन सलमान ने सत्ता पर अपनी फ़ौलादी पकड़ और भी मज़बूत कर ली है और शाही परिवार के भीतर से उत्पन्न होने वाले संभावित ख़तरों को पहले ही कुचल दिया है। हो सकता है कि अभी और भी गिरफ़तारियां हों क्योंकि यह बिन सलमान के लिए ज़िंदगी और मौत का मामला है।
यमन युद्ध तो जारी है और इसका छठां साल शुरू होने जा रहा है जबकि ज़मीन पर ताक़त का संतुलन सऊदी अरब के पक्ष में हरगिज़ नहीं है। अब सवाल यह है कि यह तेल युद्ध कब तक चलेगा और इसका नतीजा क्या होगा?
अब्दुल बारी अतवान
अरब दुनिया के जाने माने टीकाकार

