मसौली बाराबंकी। कस्बा मसौली के भुलीगज में सतनामी ब्रम्हयज्ञ गुरुग्रंथ श्रीमद् अधनिवाश जू महराज की पावन कथा वाचक व्यास पूर्णानन्द शरण दास जी ने
साहब अघ विनास सरगुण कथा के साथ साथ निर्गुण को ओत प्रोत कर रहा है और यह ग्रन्थ निर्गुनात्मक भी है हम निराकार परम ब्रह्म की ओर कभी अग्रसारित नहीं होते हैं और हम निराकार परम ब्रह्म के द्वारा ही चैतन्मय हैं ये हमें जानने की जरूरत है। महाराज दाधीज कोई ओर नहीं बल्कि वही परमहंस ईश्वर और उनकी रानी शकृत, श माने सुंदर और कृत मतलब कर्म, जिसके सुंदर कर्म हों वो सगुण मार्ग अर्थात भक्ति मार्ग पर चल रहा है और अच्छे कर्म ही मानव को भक्ति पथ पर पहुँचाते हैं। रानी शकृत और महाराज दाधीज के आँगन में एक मात्र कन्या सुभलछ्या है, सुभलछ्या कोई और नहीं हैं, सुभ मतलब आनंदित और लछ्या मतलब निर्धारण मंजिल क्योंकि मनुष्य जीवन की निर्धारित मंजिल ही भक्ति है और हमारी यह कोशिश रेहनी चाहिए की हम कुछ भी करें परन्तु हमारा अंतिम पड़ाव भक्ति तक पहुँचना ही होना चाहिए और यही मानव धर्म हैं। ईश्वर का संसार में मानव भेजनें का यही उद्देश्य है कि मानव धरा पर जाकर इन चौरासी लाख योनिओं की सेवा संरक्षण करेगा अर्थात सेवा करेगा और उनका संरक्षण करेगा और उनकी व्यवस्थाओं को विस्तारित करेगा तत्पश्चात अपना समय सार्थक करते हुए नारायण का स्मरण करेगा और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलेगा इसलिए सुभलछ्या कोई और नहीं हमारे जीवन का अंतिम पड़ाव है और अगर हमारे जीवन में भक्ति का आनंदित मार्ग नहीं है तो हमारा इस पावन धरा पर आना वृथा है जिसको अपनी सखी के माध्यम से स्वामी जी ने इस पावन ग्रन्थ में प्रमाड़ित किया है और स्वामी जी ने कहा है की-
जे के हिये नाम प्रभु नाही, ते नर वृथा जिए जग माहि।।
नर नारी सब हैं सज्ञाना, बिन हरी नाम सबे अज्ञाना।।
अर्थात इस संसार में सब ज्ञानी हैं परन्तु यदि मनुष्य हरी नाम नहीं जपता है तो उसके पास चाहे जितना ज्ञान हो वो अज्ञान ही कहलाएगा आयोजक जगजीवन राम आदि उपस्थित रहे ।
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