स्वर्ग से उतरा एक महाभारत कालीन वृक्ष जो आज पारिजात वृक्ष के नाम से देश विदेश तक विख्यात एंव अकेला वृक्ष समुद्र मंथन से प्रकट 14 रत्नों में एक है।
सिरौलीगौसपुर बाराबंकी। स्वर्ग से उतरा एक महाभारत कालीन वृक्ष जो आज पारिजात वृक्ष के नाम से देश विदेश तक विख्यात एंव अकेला वृक्ष समुद्र मंथन से प्रकट 14 रत्नों में एक है।

जनपद मुख्यालय से 40 किलो मीटर दूरस्थ रामनगर बदोसरांय कोटवाधाम मार्ग के ग्राम बरोलिया पारिजात धाम में विद्वमान देव वृक्ष पारिजात के दर्शन मात्र से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पारिजात धाम के महन्त बाबा मंगल दास जी बताते है कि महाभारत काल में माता कुन्ती को भगवान भोलेनाथ ने स्वर्ण रुपी पुष्प से प्रथम शिवार्चन करने पर कौरव पाण्डव के मध्य चल रहे युद्व में विजय की भविष्यवाणी की थी । कौरवों के पास राज सत्ता थी।महारानी कुन्ती ने अपने पुत्र अर्जुन से बात बताई अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को बात बताई अर्जुन और श्रीकृष्ण स्वर्ग की स्वर्ण बटिका में गये और वहीं से समुद्र मंथन के 14 रत्नों में एक रत्न पारिजात नामक वृक्ष को अर्जुन ने अपने बाण से पृथ्वी लोक में बरोलिया धाम में स्थापित कर दिया। जो की कुन्तेश्वर धाम किन्तूर भोलेनाथ के मन्दिर से मात्र 2 किलो दूरी पर है। अज्ञात वास के दौरान महारानी कुन्ती ने पारिजात पुष्प से भगवान भोलेनाथ का प्रथम शिवार्चन किया उनके पुत्र विजय एंव खोया राजपाठ प्राप्त किया।
महन्त मंगल दास बताते हैं कि गंगा दशहरा को पारिजात वृक्ष में पुष्प आते हैं पुष्प एंव वृक्ष के दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की सम्पूर्ण कामनाएं पूरी होती हैं। पारिजात वृक्ष को कल्पतरु ,कल्पदानया कल्पवृक्ष भी कहते हैं।पांडव अज्ञात वास के समय अपने तपोबल से पृथ्वी पर लाये तथा अर्जुन ने अपने बाण पाताल तक छिद्र करके इसे रोपित किया इस लिए यह वृक्ष प्राचीन काल से ही पूज्यनीय रहा है। जनश्रुति है कि इस अलौकिक एंव अद्वितीय वृक्ष के समान विश्व में दूसरा वृक्ष नहीं है।वृक्ष का तना 10मीटर मोटाई का है इसमें इस समय सफेद रंग का फूल आया हुआ है जो सूखने के बाद स्वर्ण रुपी आभा मे दिखते हैं।
पारिजात पुष्प के दर्शन से मानव कल्यांण की अनुभूति प्रकट होती है।

