तेरे हजूर अपना ये सर क्यों झुकाऊँ मैं:माना कि मोहतरम है मगर तू खुदा नहीं बज़्म-ए-तहफ़्फ़ुज़-ए-उर्दू की जानिब से महफ़िल-ए-शायरी का आयोजन उर्दू हमें तहज़ीब व अदब सिखाती है:राही सिद्दीक़ी नई नस्लों को उर्दू की तालीम से आरास्ता कीजिये:रिज़वान मुनीर तमाम ज़बानों में सबसे मीठी ज़बान उर्दू है:नसीम गुड्डू
फतेहपुर, बाराबंकी। उर्दू हमें तहज़ीब व अदब सिखाती है अगर ये बात समझनी है तो उर्दू की महफिलों में उठना बैठना होगा और मुशायरों व अदबी नाशिस्तों में शिरकत करनी होगी। उक्त विचार अहमद एजुकेशनल एकेडमी हॉल फतेहपुर में बज़्म-ए-तहफ़्फ़ुज़-ए-उर्दू द्वारा आयोजित महफ़िल-ए-शायरी के मौके पर अध्यक्षता कर रहे उस्ताद शायर रही सिद्दीकी ने व्यक्त किये उन्होंने कहा कि समाज में इस तरह के कार्यक्रमों से साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारा बढ़ता है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ऑल इण्डियन प्रेस जर्नलिस्ट एसोसिएशन फतेहपुर इकाई के अध्यक्ष रिज़वान मुनीर ने अपने सम्बोधन में कहा कि नई नस्लों को उर्दू से आरास्ता कीजिये, क्योंकि साइंस, कम्प्यूटर और टेक्नोलॉजी के इस दौर में हमारे बच्चे उर्दू भाषा की तालीम हासिल नहीं कर पा रहे हैं। पूर्व ज़िला पंचायत सदस्य नसीम गुड्डू ने अपने वक्तव्य में कहा कि तमाम ज़बानों में सबसे मीठी ज़बान उर्दू है, उर्दू मोहब्बत का पैग़ाम देती है। इसके अलावा इंजीनियर मो0 इक़बाल, मो0 अनवर एडवोकेट ने भी अपने विचार रखे। महफ़िल-ए-शायरी में शायरों ने अपनी अपनी ग़ज़लों के अशआर सुनकर श्रोताओं का मन मोह लिया और खूब वाह वाह लूटी। कार्यक्रम में राही सिद्दीकी ने पढ़ा- न होगा माँ का जो साया हमारे सर जिस दिन, तो कौन उम्र दराज़ी की फिर दुआ देगा। अहमद सईद हर्फ़ ने अपने अनूठे अंदाज़ में पढ़ा- तेरे हुज़ूर अपना ये सर क्यों झुकाऊँ मैं, माना कि मोहतरम है मगर तू ख़ुदा नहीं। संचालन कर रहे अमीर फैसल लखनवी ने पढ़ा- इतने गम हैं फिर भी पागल नहीं हुआ, यानी कि मेरा इश्क़ मुकम्मल नहीं हुआ। मेराज बाराबंकवी ने पढ़ा- किसी हसीन के जलवों का फ़ैज़ है वरना, हसीन इतना कभी पहले माहताब न था। हसन नईमी ने पढ़ा- भटक रहा हूँ आवारा बादलों की तरह, वो शख़्स फिर भी मेरी रहनुमाई मांगता है। हस्सान साहिर ने पढ़ा- हमारे मुल्क की ये बदनसीबी ही तो है साहिर, यहाँ एक चाय वाला भी हुकूमत छीन लेता है। मोतीउल्लाह हुसैनी ने पढ़ा- दुशवारियों का सामना एक दिन करेगा वो, जीना हमारा आज जो दुशवार करे है। इमरान सेहबा ने पढ़ा- इसलिए घर के दरीचों को खुला रखता हूँ, उसके आने का तो मौसम भी पता देता है। शादाब अनवर ने पढ़ा- हराम मौत मरेगा किसी की चाहत में, जिसे ये इल्म नहीं है कि खुदकुशी क्या है। अंत में बज़्म के अध्यक्ष अहमद सईद हर्फ़ ने सभी का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर कलीम नईमी, इश्तियाक कुरैशी, मो0 इमरान, मो0 अकरम अंसारी, शफ़ाअत रसूल, मो0 रेहान, अब्दुल मालिक, मो0 अंजर, मो0 गुफरान आदि श्रोता उपस्थित रहे।

