बाराबंकी। () बज़्म अज़ीज़ का मासिक तरही मुशायरा बज़्म के अध्यक्ष हाजी नसीर अंसारी के आवास पर आयोजित किया गया।जिसकी अध्यक्षता उस्ताद शायर ज़मीर फ़ैज़ी ने की, जबकि सफ़ल संचालन हुज़ैल लालपुरी ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में जमाल अख़्तर उस्मानी,एस एम हैदर और असग़र उस्मानी (मोहम्मद मियां) उपस्थिति रहे। इस अवसर पर शायरों ने एक से बढ़कर एक कलाम पेश किए।

ज़मीर फ़ैज़ी – मेरा किरदार मत कुचल वर्ना।दम निकल जाएगा कहानी का।।
हाजी नसीर अंसारी – बात जब है कि हो हज़ारों साल। ज़िक्र तेरी मेरी कहानी का।।
हुज़ैल लालपुरी- तूने ग़म से मुझे नवाज़ दिया। शुक्रिया तेरी मेहरबानी का।।
सग़ीर नूरी- उस बशर की तलाश है मुझको।फ़न सिखाए जो शादमानी का।।
मास्टर इरफ़ान अंसारी – उसने मांगा था ज़िंदगानी का। दे ना पाए हिसाब पानी का।।
डॉक्टर रेहान अलवी – तेरे बच्चों में भी ना आ जाए। कुछ असर तेरी बदज़ुबानी का।।
इरशाद बाराबंकवी – इंतज़ाम आज करके लौटा हूं। अपने बच्चों के दाना पानी का।।
आदर्श बाराबंकवी – देश के क़ौम के ना काम आए। फ़ायदा क्या फिर उस जवानी का।।
नफ़ीस बाराबंकवी – चार दिन इंतज़ार कर लीजिए। रंग बदलेगा फिर कहानी का।।
बशर मसौलवी – एक-एक लम्हा ज़िंदगानी का। क़र्ज़ है रब की मेहरबानी का।।
आरिफ़ शहाबपुरी- मैं जो लाया गया हूं दार तलक। ये नतीजा है हक़ बयानी का।।
सरवर किन्तूरी – तेरी यादों में गुज़रे हर लम्हा। तेरे सरवर की ज़िंदगानी का।।
तुफ़ैल ज़ैदपुरी- मैं ना लाएं जो पानी होंटो पर। दिल तड़पता रहेगा पानी का।।
मिस्टर अमेठवी- पहले जैसा वो अब सुकून कहां। तर्ज़ बदला है हुक्मरानी का।।
सबा जहांगीराबादी- क़ब्र पर ख़ुद अज़ाब बन जाए। काम ऐसा हो ज़िंदगानी का।।
नज़र मसौलवी- सख़्त गर्मी है घर से जब निकलो।पास बोतल हो ठंडे पानी का।।
मुशायरे के समापन पर बज़्म के जनरल सेक्रेटरी हुज़ैल लालपुरी ने सभी शायरों और श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। बज़्म के अध्यक्ष हाजी नसीर अंसारी ने ऐलान किया कि अगली नशिस्त “जहान में कोई साबिर हुसैन सा ना हुआ ” सलाम के मिसरा तरह पर होगा,सा ‘क़ाफ़िया’ और ‘ना हुआ’ रदीफ़ है।

