रविदास जयंती और माघ पूर्णिमा पर संकल्प बनाओ की मांस नहीं खाओगे – बाबा उमाकान्त जी महाराज अगर सब लोग मांस खाना बंद कर दें तो कोई जानवर कटेगा ही नहीं
मामून अंसारी जिला ब्यूरो चीफ एसएम न्युज24 टाइम्स बाराबंकी
बाराबंकी । वक्त के सन्त सतगुरु परम पूज्य बाबा उमाकान्त जी महाराज ने माघ पूर्णिमा एवं सन्त रविदास जयंती के अवसर पर आयोजित सतसंग के कार्यक्रम में सभी से आज के दिन से मांस नहीं खाने का संकल्प बनाने को कहा। बाबाजी ने कहा कि भारत देश सन्तों का देश कहा गया और उन्हीं सन्तों में एक रविदास जी भी हुए। आज माघ पूर्णिमा एवं रविदास जयंती है, तो इस दिन आपको संकल्प बनाना है कि हम अब आज से मांस नहीं खाएंगे। अभी तक जो हमसे गलती हुई, अब नहीं करेंगे और अब हम जीवों पर दया करेंगे। अगर सब लोग संकल्प बना कर मांस खाना बंद कर दें तो कोई जानवर नहीं कटेगा और फिर यह सब अपनी मौत मरेंगे, क्योंकि यही जीवात्मा उनके अंदर भी है, लेकिन सजा भोगने के लिए डाली जाती है।
दया धर्म तन बसे शरीरा, ताकर रक्षा करे रघुवीरा
जब जीवात्मा शरीर से तड़प-तड़प कर निकलती है तो उस मालिक को आवाज लगाती है कि देखो प्रभु हमको कैसे मार रहे, काट रहे। फिर वह प्रभु बर्दाश्त नहीं करता है, कर्मों की सजा मिलती ही मिलती है। कबीर साहब ने कहा है – “जो गल काटे और का अपना रहा कटाय, साहिब के दरबार में बदला कहीं न जाए” तो बदला देना ही पड़ता है। नर्कों में कर्मों के अनुसार सजा मिलती है, मारे-काटे जाते हैं। तो अगर आप संकल्प बना लो और लोगों को भी बनवाओ कि शाकाहारी हो जाओ, जीवों पर दया करो, क्योंकि कहा गया – “दया धर्म तन बसे शरीरा, ताकर रक्षा करें रघुवीरा।” दया को धर्म बताया गया है।
यहाँ मृत्यु लोक में भी बदला चुकाना पड़ता है और वहाँ ऊपर भी चुकाना पड़ता है
एक आदमी तालाब के किनारे मछली मार रहा था। महात्मा जी अपने चेले के साथ वहाँ से गुजर रहे थे। चेला देख रहा था कि वह आदमी मछलियों को पानी से बाहर निकालकर उछाल रहा था, जिससे वे तड़प-तड़पकर मर रही थीं।
चेला गुरुजी से बोला, “गुरुजी, इस आदमी को ही मार दीजिए। देखिए, यह कितने जीवों को मार रहा है!”। गुरुजी ने उत्तर दिया, “हमारा काम यह नहीं है, सन्तों का काम दया करना होता है। सन्तों का काम काल का नहीं होता”।
कुछ दिनों बाद, वही महात्मा जी और उनका चेला राजस्थान की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक ऊँट को पड़ा हुआ देखा। ऊँट को लोग छोड़ जाते हैं जब गिर जाता है, उठा नहीं पाते हैं। उसमें एक झिल्ली होती है, तो पानी भर लेता है और उसे 15 दिनों तक पानी की जरूरत नहीं पड़ती है, लेकिन उसके बाद में फिर जरूरत पड़ जाती है। रेगिस्तान में पानी जल्दी मिलता नहीं है, तो ऊँट गिर जाते थे। यह ऊँट भी गिर पड़ा और लंबे समय तक बिना पानी के पड़ा रहा।
धीरे-धीरे उसके शरीर में सड़न आ गई, और उसमें कीड़े पड़ गए। तब चेला ने गुरुजी से कहा, “गुरुजी, देखिए, यह ऊँट तड़प रहा है, और ये कीड़े इसे खा रहे हैं। जब यह हिलता है, तो ये और अधिक काटने लगते हैं। तो आप इसे मार दीजिए”। गुरुजी बोले, “मैंने पहले भी कहा था कि हमारा काम मारने का नहीं है।” फिर वे बोले, “क्या तुझे पता है कि यह कौन है?” चेला बोला, “नहीं! गुरुजी”।
गुरुजी ने समझाया, “यह ऊँट वही मछुआरा है और ये कीड़े वे मछलियाँ हैं जिन्हें उसने मारा था। अब वे बदला ले रही हैं। जैसे उसने उन्हें तड़पाया था, वैसे ही आज ये कीड़े इसे तड़पा रहे हैं”। तो इसी तरह बदला यहाँ मृत्यु लोक में भी देना पड़ता है और वहाँ ऊपर भी देना पड़ता है। साहब के दरबार में बदला चुकाना पड़ता है।मामून अंसारी जिला ब्यूरो चीफ एसएम न्युज24 टाइम्स बाराबंकी

