करबला सहित इराक़ के पवित्र स्थलों पर हमले की कोशिश में है दाइशः हश्दुश्शाबी

समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ

विशेषज्ञ यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कोरोना वायरस में इतनी अनिश्चितता क्यों है। इस सवाल का जवाब वायरस से बचने में काफ़ी मदद कर सकता है।
कोरोना वायरस अब तक भारी संख्या में लोगों की जान ले चुका है। ईरान, सऊदी अरब, कुवैत, क़तर और इमारात में कोरोना वायरस व्यापक रूप से फैला लेकिन इराक़ में इसका फैलाव बहुत सीमित रहा। इराक़ में कोरोना वायरस से होने वाली मौतें 100 से कम हैं।
डोमिनिकन रिपब्लिक में कोरोना के 7600 केस सामने आए मगर हैती में केवल 85 मामले प्रकाश में आए। इंडोनेशिया में कहा जाता है कि कोरोना से मरने वालों की संख्या हज़ारों में है मगर पड़ोसी देश मलेशिया में जहां कड़ा लाक डाउन लगा है मरने वालों की संख्या 100 के आसपास है।
कोरोना वायरस लगभग दुनिया के हर देश में पहुचा है मगर इसका असर अलग अलग जगहों पर विभिन्न स्तर का रहा है। न्यूयार्क, लंदन और पेरिस में इस बीमारी ने भारी तबाही मचा दी मगर बैंकाक, बग़दाद, नई दिल्ली और लागोस में स्थिति बेहतर है।यह एक पहेली है कि कोरोना वायरस कुछ जगहों पर भारी तबाही मचा रहा है तो दूसरी कुछ जगहें इसके दंश से सुरक्षित हैं। वैसे तो इस बारे में कई प्रकार की अटकलें हैं लेकिन सुनिश्चित जवाब अब तक नहीं मिल सका है। इस सवाल का जवाब मिल जाए तो यह समझना आसान हो जाएगा कि सरकारों को कोरोना से कैसे निपटना चाहिए और कब लाक डाउन जैसी व्यवस्थाएं हटाकर जीवन को समान्य किया जाना चाहिए।इस समय दुनिया भर में सैकड़ों की संख्या में शोध हो रहे हैं कि डेमोग्रैफ़ी का इस सदंर्भ में क्या असर है और जेनेटिक्स का इस में क्या रोल रहा है।
सऊदी अरब में डाक्टर यह रिसर्च कर रहे हैं कि जेनेटिक अंतर का क्या कोरोना के गंभीर लक्षणों और हल्के लक्षणों पर कोई असर है? ब्राज़ील में यह रिसर्च की जा रही है कि जेनेटिक्स और कोरोना की जटिलताओं में क्या रिश्ता है? कई देशों में यह स्टडी चल रही है कि समान रूप से हाइपर टेंशन इलाज करने से कहीं बीमार की हालत बिगड़ तो नहीं जाएगी।

कई विकासशील देश जहां गर्मी पड़ती है और आबादी का अधिक हिस्सा युवाओं का है इस बीमारी से काफ़ी हद तक सुरक्षित रहे। इससे तो यही लगता है कि तापमान और युवा आबादी का कोरोना के हल्के प्रकोप पर असर रहा है। मगर पेरू, ब्राज़ील और इंडोनेशिया को देखकर यह विचार ग़लत साबित हो जाता है। सामाजिक दूरी और तत्काल लाक डाउन का कोरोना को रोकने में असर रहा मगर म्यांमार और कम्बोडिया ने दोनों में से कोई काम नहीं किया फिर भी वहां केस बहुत कम हैं।

दुनिया भर में संक्रामक रोगों पर रिसर्च करने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि अभी चूंकि सारे देशों से पूरी जानकारियां नहीं मिल पाई हैं इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना ख़तरनाक हो सकता है। मगर विशेषज्ञ यह तो मानते हैं कि आबादी में युवाओं के अनुपात, रहन सहन के तरीक़े, पर्यावरण और सरकारों की तत्काल कार्यवाही का कोरोना पर अंकुश लगने या विकट रूप से फैलने में गहरा असर रहा है।
जान हापकिन्स युनिवर्सिटी में संक्रामक रोग के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर राबर्ट बोलिंगर का कहना है कि युवा अगर कोरोना से संक्रमित होते हैं तो लक्षण या तो दिखाई ही नहीं पड़ते या बहुत हल्के होते हैं दूसरी बात यह है कि युवाओं से वायरस दूसरों को बहुत कम ट्रांसफर होता है।
अफ़्रीक़ा महाद्वीप की आबादी 130 करोड़ है और वहां कोरोना के अब तक 45 हज़ार पुष्ट मामले हैं। इस महाद्वीप में 60 प्रतिशत आबादी युवाओं की है जिनकी उम्र 25 साल से कम है। थाइलैंड और इराक़ के नजफ़ इलाक़े में स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि 20 से 29 साल की आयु के युवाओं में सबसे अधिक संक्रमण हुआ मगर लक्षण बहुत कम ज़ाहिर हुए। जबकि दूसरी ओर इटली में समाज की औसत उम्र 45 साल है। इस देश में कोरोना से बहुत मौतें हुईं।

सिंगापुर और सऊदी अरब में संक्रमित होने वालों की बड़ी संख्या प्रवासियों की बताई जा रही है। यह लेबर क्लास के लोग हैं जो स्वस्थ हैं और कोरोना से संक्रमित होने के बावजूद उनमें अधिकतर को अस्पताल में भर्ती करने की ज़रूरत नहीं पड़ी अमरीका के डाक्टरों का कहना है कि जवानी के साथ ही अच्छा स्वास्थ्य भी बीमारी का मुक़ाबला करने में एक प्रभावी फ़ैक्टर है। जापान की आबादी में बूढ़ों का अनुपात अधिक है मगर वहां 520 मौतें हुई हैं। वहीं इक्वाडोर का गुवायास इलाक़ा जवान आबादी वाला इलाक़ा है वहां केवल 11 प्रतिशत  लोग बूढ़े हैं मगर इस इलाक़े में 7 हज़ार जानें चली गईं। हार्वर्ड युनिवर्सिटी के डाक्टर झा का कहना है कि कुछ कारण एसे हैं जो युवाओं को भी कोरोना से संक्रमित होने की स्थिति में जानलेवा हालत में पहुंचा देते हैं मगर अब तक इन कारणों का पता नहीं चल सका है।कल्चरल फ़ैक्टर की बात की जाए तो कुछ समाजों में सोशल डिस्टेंसिंग का माहौल पहले से ही है। मगर इराक़ जैसे फ़ार्स खाड़ी के कई देशों में लोग एक दूसरे से गले मिलते हैं मगर वहां संक्रमण कम है।
अधिकतर विशेषज्ञ इस स्थिति को देखकर यह नज़रिया देते हैं कि कोरोना वायरस का फैलाव कम या ज़्यादा होने इसी तरह मौतों की संख्या अधिक या कम होने का कोई एक कारण नहीं बल्कि कई कारण हैं।

कोरोना से बनी स्थिति का दुरुपयोग करते हुए आतंकवादी गुट दाइश करबला सहित इराक़ के पवित्र स्थलों पर हमले करने की कोशश कर रहा है।इराक़ के स्वयंसेवी बल इश्दुश्शाबी ने करबला में दाइश के एक आतंकी हमले को विफल बना दिया।फ़ार्स न्यूज़ एजेन्सी के अनुसार हश्दुश्शाबी की 26वीं बटालियन के कमांडर ने बताया है कि उनकी बटालियन ने करबला में हमला करने की दाइश की एक योजना को पूरी तरह से फेल कर दिया।  इसी बीच हश्दुश्शाबी के एक अन्य कमांडर अबू हसन ने चेतावनी दी है कि दाइश के आतंकवादी, सामर्रा में पवित्र स्थलों पर हमला कर ना चाह रहे थे।  उन्होंने हश्दुश्शाबी के जवानों से कहा है कि दाइश के आतंकी, सामर्रा में इमाम हसन असकरी के रौज़े को लक्ष्य बनाना चाह रहे हैं।
ज्ञात रहे है कि आतंकवादी गुट दाइश ने शनिवार की सुबह उत्तरी सामर्रा में इराक़ के स्वयंसेवी बलों पर हमला कर दिया था।  दाइश के इस कायराना आक्रमण में हश्दुश्शाबी के 10 सदस्य शहीद हो गए थे जबकि 4 अन्य घायल हुए थे।

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