ईरान के खिलाफ ट्रम्प का आखिरी जुआ कितना खतरनाक है ? पूर्व अमरीकी कूटनैतिक का पढ़ने लायक लेख!
समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ
सन 2016 में ब्रिटेन के तत्कालीन विदेशमंत्री बोरिस जान्सन को जब इस बात पर आग्रह था कि ब्रिटेन युरोप से ब्रिटेन पलायन की प्रक्रिया को सीमित कर सकता है लेकिन साथ ही युरोपीय संघ के साथ कस्टम युनियन का सदस्य भी रह सकता है तो उन्होंने कहा था कि एक केक के प्रति मेरी नीति एक साथ ही उसे खाना और रखना भी है।आज 4 इस बयान को चार साल गुज़रने के बाद ब्रिटेन के पास वह केक बचा नहीं है जिसकी बात बोरिस जान्सन कर रहे थे। अब ट्रम्प ने कहा है कि वह परमाणु समझौते के उल्लंघन के लिए ईरान के खिलाफ सुरक्षा परिषद में शिकायत करने का इरादा रखते हैं हालांकि वह यह समझ नहीं रहे हैं कि बोरिस जान्सन की तरह वह भी बहुत बड़ी गलत फहमी में हैं। सब से बुरी बात तो यह है कि ट्रम्प इस तरह से ईरान को परमाणु क्षेत्र में हर प्रकार की सीमा से मुक्त कर देंगे, सुरक्षा परिषद में अमरीका को कमज़ोर करेंगे, युरोपीय घटकों को वाशिंग्टन से दूर करेंगे और इससे अमरीका की प्रतिष्ठा को लंबे समय के लिए झटका लग जाएगा।
अमरीका यह सारी भाग दौड़ इस लिए कर रहा है ताकि अक्तूबर में ईरान के खिलाफ हथियारों का जो प्रतिबंध खत्म हो रहा है उसकी अवधि बढ़ायी जाए। यह प्रतिबंध सन 2010 में लगाये गये थे और सन 2015 में ईरान, रूस और चीन ने मांग की थी कि इस प्रतिबंध को खत्म किया जाए। लेकिन सुरक्षा परिषद परमाणु समझौते की पुष्टि करते हुए इस प्रतिबंध को अक्तूबर सन 2020 तक के लिए बढ़ा दिया था। ईरान पर प्रतिबंधों का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है इस लिए हमने मध्य पूर्व के मामले में बाराक ओबामा की सरकार के संयोजक होने के नाते दौरान राष्ट्रपति बाराक ओबामा और अन्य सहयोगियों के साथ मिल कर यह तय किया कि हथियारों पर प्रतिबंध को खत्म कर दिया जाए।

वर्तमान समय में ट्रम्प की सरकार ईरान के खिलाफ हथियारों के प्रतिबंध की अवधि बढ़ाने के लिए सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पेश करना चाहती है और निश्चित रूप से रूस इस प्रस्ताव को वीटो कर देगा। जब यह प्रस्ताव सुरक्षा परिषद में पेश होगा तो ट्रम्प परमाणु समझौते के युरोपीय पक्षों अर्थात ब्रिटेन , फ्रांस और जर्मनी पर दबाव डालेंगे कि वह ट्रेगर मेकेनिज़्म को शुरु करें और ईरान पर प्रतिबंधों को दोबारा लगाए जाने की मांग सुरक्षा परिषद में रखें। इन तीनों देशों में ब्रिटेन सब से अधिक अमरीका का समर्थन करता है। ब्रिटेन के वर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जान्सन हो सकता है ब्रेग्ज़िट के बाद वाशिंग्टन से अच्छे व्यापारिक संबंधों के लालच में ट्रम्प की बात मान लें लेकिन यह भी हो सकता है कि वह विरोध करें और अगर वह विरोध करते हैं तो फिर अमरीका के पास इसके सिवाए कोई रास्ता नहीं रहेगा कि वह स्वंय को उस परमुण समझौते का हिस्सा कहे जिससे वह सन 2018 में निकलने का एलान कर चुका है ट्रम्प सरकार का जुआ बहुत खतरनाक है। कमज़ोर तर्कों के आधार पर अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी बहुत भयानक गलती होगी क्योंकि भविष्य में इस से चीन और रूस को भी इस बात का अवसर मिलेगा कि वह भी इसी तरह के कमज़ोर तर्क और बहानों से अपने हितों की पूर्ति करें। इस समय भी ईरान, तेल की कीमत में कमी और प्रतिबंधों की वजह से आधुनिक हथियार नहीं खरीद सकता लेकिन बहरहाल प्रतिबंध खत्म होने से उसे कानूनी अधिकार तो हासिल हो ही जाएगा लेकिन ट्रम्प की योजना, सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय नियमों को कमज़ोर करने के अलावा कुछ नहीं है। ईरान के साथ समझौते पर हस्ताक्षर सन 2015 में ओबामा सरकार की एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी अगर अमरीका सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव को पूरी तरह से खत्म करता है तो फिर वैसा समझौता दोबारा नहीं हो पाएगा।
ट्रेगर मैकेनिज़्म को भी बिना ठोस तर्क के सक्रिय नहीं किया जा सकता यह भी अमरीका के लिए अपने घटकों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए एक झटका हो सकता है। ट्रम्प ने पहले ही नेटो के अनुच्छे 5 पर सवाल खड़े करे, पेरिस समझौते से निकल कर और युरोपीय घटकों या नेटो से विचार विमर्श किये बिना सीरिया से अमरीकी सैनिकों को वापस बुला कर, अपने युरोपीय घटकों के साथ संबंधों को गंभीर नुक़सान पहुंचा चुके हैं। युरोप की इच्छा के विपरीत ईरान के साथ परमाणु समझौते से निकल कर ट्रम्प ने अपने युरोपीय घटकों को एक और झटका दिया और अब सुरक्षा परिषद में ईरान के खिलाफ प्रस्ताव पेश करके वह एक बार फिर युरोप के साथ अपने संबंधों को अधिक कमज़ोर करेंगे।

इन सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने हित के लिए ईरान के साथ परमाणु समझौते में फेर बदल की ट्रम्प की यह अंतिम कोशिश हो सकता है इस समझौते को पूरी तरह से खत्म ही कर दे। ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव को अधिकतम सीमा तक ले जाने के प्रचारों के बावजूद यह सच्चाई है कि ट्रम्प सरकार अपना मकसद पूरा नहीं कर पायी। पिछले दो वर्षों के दौरान ट्रम्प न तो ईरान के साथ नये परमाणु समझौते में सफल हुए और न ही वह ईरान के व्यवहार में कोई बदलाव ला पाए और न ही ईरान की सरकार को बदल पाए। इस दौरान ईरान मैदान में डटा रहा और अमरीका के निकलने के बावजूद वह परमाणु समझौते से नहीं निकला क्योंकि ईरान को अब भी उम्मीद है कि सन 2020 के नंवबर के महीने में चुनाव के बाद एक डेमोक्रेट राष्ट्रपति वाइट हाउस में जाएगा और समझौते को फिर से जीवित कर देगा। अगर अमरीका ईरान पर समझौते से खत्म हुए सारे प्रतिबंध दोबारा लगाने में सफल होता है तो ईरान भी पूरी तरह से इस समझौते से निकल जाएगा। ट्रम्प यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने अब तक कि सब से बुरे समझौते को खत्म कर दिया है लेकिन सच्चाई यह है कि उसके बाद ईरान पूरी तरह से आज़ाद होगा और वह बिना किसी अंतरराष्ट्रीय निगरानी के अपना परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ाएगा फिर उसे रोकने का एक ही रास्ता बचेगा और वह होगा सैनिक रास्ता। Q.A. साभार, वॉर आन द रॉक्स

