भोजन वाले भैया तो कोई चाय वाले भाई साहब बोलकर बुलाता है मुझे: नितेश मिश्रा लॉक डाउन में इंसानियत को सेवा भाव के साथ परिभाषित कर रहे नितेश जिलाधिकारी को नही पता है कि उनके बाबू का लड़का कर रहा ऐसा काम

संपादक मोहिनी शर्मा एडवोकेट

बाराबंकी। राह संघर्ष की जो चलता है वो ही संसार को बदलता हैं, जिसने रातों से है जंग जीती.. सुबह सूर्य बनकर वही चमकता है।     यह पंक्तियां उस शख्स पर सटीक बैठती है जो न नेता और न ही अभिनेता है। फिर भी लोगों के दिलों में जगह बना कर चर्चा में है। कोई भोजन वाले भैया तो कोई चाय वाले भाई साहब बोलता है। लॉकडाउन  में इनके द्वारा जारी समाजसेवा चर्चा का विषय बनी है। हम बात कर रहे है पटेल नगर दशहरा बाग निवासी नितेश मिश्रा की। साधारण परिवार में जन्में नितेश मिश्रा बचपन से ही अच्छे संस्कारों में पले बढ़े। बाबा गोमती प्रसाद मिश्रा जिला जज के अर्दली के रूप में कार्यरत थे। उनके बाद मेरे पिता मुकेश कुमार मिश्रा जिलाधिकारी कार्यालय में कार्यरत हैं। उन्होंने बताया कि आप समझ सकते है कि आर्थिक स्थित क्या होगी, ज्यादा कुछ खाश अच्छी नही। उन्होंने कहा कि हम जो कर रहे है यह बात जिलाधिकारी को नही पता है कि हम उनके बाबू के लड़के है। यही हमारी जीत है कि लोग अपने पिता के नाम से जाने जाते है लेकिन हमारे नाम से मेरे पिता जाने जाते है। हमे गर्व होता है कि जब लोग कहते है कि यह नितेश के पिता है। मेरा मानना है कि प्रत्येक माता- पिता की यही इच्छा होती है। हमने लखनऊ विश्व विद्यालय से ग्रेजुएशन और अवध विश्वविद्यालय से एलएलबी साथ ही साथ कंप्यूटर शिक्षा भी ग्रहण की है। हमे हमेशा अपने से बड़ो के साथ काम करने का अवसर मिला, जिनसे हमने बहुत कुछ सीखा। हमने कभी नौकरी के लिए नही सोचा लेकिन जब बच्चा पढ़ लिखकर बड़ा हो जाता है। तो परिवार के सभी लोग चाहते है कि बच्चे को अब कही नौकरी करनी चाहिए। उस स्थित में हमें फतेहपुर तहसील में सेवा करने का अवसर मिला। उन्होंने बताया यह नौकरी संविदा बेस्ड थी लेकिन बहुत कुछ सीखने को मिला। खशकर मुझे तहसील से अनुशासन सीखने को मिला। गांवों में बुजुर्ग कहावत कहा करते थे कि पढ़ो कम, कड़ो ज्यादा यही समझकर हमने नौकरी की। कुछ समय के बाद मुझे लगा कि फतेहपुर ज्यादा दूर पड़ता है। यहाँ बहुत समय तक संभव नही था। क्योंकि हमारा लक्ष्य पीसीएस जे था इसलिए हमने नौकरी छोड़ दी। उन्होंने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि हमे वकालत की प्रेरणा तहसील फतेहपुर में कार्य करते हुए मिली। जब कोई गरीब परेशान बिना चप्पल के किसी काम के लिए वकील के पास जाता था और पैसे देता था। उस स्थित में हमने वकील बनने का निर्णय लिया। आज हम लोगो को गरीब स्थित में देखकर बिना पैसे की सेवा करते है। उन्होने एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि हम अपनी जिंदगी का एक दिन नही भूल सकते है। नौकरी में रहते हुए उप जिलाधिकारी फतेहपुर सुनील वर्मा और तहसीलदार डी. के. श्रीवास्तव थे। उस समय आईजीआरएस नया लांच हुआ था एक ऐसा समय आया जब तहसील की स्थित संदर्भ के निस्तारण के मामले में बिल्कुल जीरो थी। जिलाधिकारी के द्वारा उप जिलाधिकारी का वेतन भी बाधित कर दिया गया था। तब अपर जिलाधिकारी के द्वारा मुझे आईजीआरएस सहायक के रूप में तैनात किया था। दिन-रात अथक प्रयास करने के साथ टीम वर्क किया। संदर्भो के सारे निस्तारण के बाद जब हमारी तहसील जनपद में प्रथम स्थान पर आयी तब मुझे उप जिलाधिकारी ने एक पेन गिफ्ट किया था और मेरे लिए खड़े होकर जो ताली बजायी थी। वह दिन मेरे लिए बहुत खुशी का दिन था। वह अच्छा इसलिए था क्योंकि उप जिलाधिकारी बनना आसान नही होता है। लेकिन जब एक उप जिलाधिकारी आपके लिए ताली बजाये तो बड़ी बात है। उन्होंने कहा हम कोई बड़े समाजसेवी नही है। हालांकि विगत 17 वर्ष से जनपद की शान कहे जाने वाली रामलीला समिति से जुड़ा हूँ और उसमें राक्षसों की सेना का साज-सज्जा करता हूँ। ऐसे ही कार्यों से जुड़ा होने के कारण यह सेवाभाव से कर रहा हूँ। मैं जनता कर्फ्यू के दिन पिता जी को ऑफिस छोड़ने गया था। रास्ते मे हमने कुछ ऐसे लोगो को देखा जो इस काबिल नही थे कि वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सके। यह देखकर हमारे मन मे विचार आया कि क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे लोगों को मदद मिल सके। हमने यह सेवा शुरू की और उसके बाद लोग जुड़ते गए और कारवां बनता गया। यह सेवा लगातार जारी है। उन्होंने यह भी बताया कि भोजन पानी वितरण के बाद शाम होते ही चाय की सेवा शुरू हो जाती थी। लॉकडाउन उनके कारण हमारे स्वास्थ्यकर्मी व पुलिस कर्मचारियों को चाय नहीं मिल पा रही थी। हमने स्वयं चाय बना कर लोगों तक पहुंचाने का काम किया। जिसमें हमारी मित्रों ने सहयोग भी किया। इस दौरान मुझे एक व्यक्ति ऐसा भी मिला जो अंधा था उसके पास रखा खाना था लेकिन पास खड़ी गाय खा रही थी। हमारे द्वारा चाय पूछने पर उसने कुछ पैसे देने की कोशिश की उसने कहा साहब पहले लोग चाय पिला देते थे लेकिन अब दुकाने नहीं खुलती है। उस व्यक्ति ने अंधे होने के बाद भी जो ईमानदारी पेश की मैं द्रवित हो उठा। उन्होंने कहा हमारा प्रयास लॉकडाउन तक निरंतर जारी रहेगी।

संपादक मोहिनी शर्मा एडवोकेट

 

 

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