शहज़ादी फ़ातिमा ज़हरा के क़सीदे का नाम सूरये कौसर है : इब्ने अब्बास

मामुन अंसारी जिला ब्यूरो बाराबंकी(एस0एम0 न्यूज 24 टाइम्स)9044641489

बाराबंकी। इस्लाम की तरक्की किसी भी दौर में काफ़िरों को बर्दाश्त नहीं हुई।लेकिन काफ़िर भी जानता था कि दीने इस्लाम की बक़ा असहाब से नहीं औलाद से होगी। इसीलिए मोहम्मद (स.अ.व.) को कुफ्फारे मक्का ताना देते थे कि इनके तो कोई औलाद ही नही है अबतर है। इनका दीन एक दिन ख़त्म हो जायेगा। तब परवरदिगार ने अपने हबीब को अबतर के जवाब में तोहफये कौसर अता किया। यह बात मस्जिद इमामिया सट्टी बाज़ार (जुमा मस्जिद) में मजलिसे तिमाही बराए ईसाल ए सवाब मरहूमा सय्यदा कनीज़ मेहदी बिन्ते सैयद हुसैन अहलिया हाजी सरवर अली करबलाई को खिताब करते हुए ज़ाकिरे अहले बैत मौलाना इब्ने अब्बास ने कही। उन्होंने ये भी कहा कि बग़ैर तवल्ला, तबर्रा व तक़वे के कोई इंसान मोमिन नहीं हो सकता। कौसर से मुराद नश्ले कसीर है जिसकी इकलौती मिस्दाक़ फातिमा जहरा (स.अ.) है जिनकी नश्लआज भी परदये ग़ैब में है। दुनियां के हर खित्ते में नश्ले सय्यिद का होना भी इसकी एक दलील है। शहज़ादी फ़ातिमा ज़हरा के क़सीदे का नाम सूरये कौसर है।
आखिर में करबला वालों केमसायब पेश किए जिसे सुनकर सभी रोने लगे। मजलिस से पहले हाजी सरवर अली करबलाई ने पढ़ा छोड़कर दुनियां की लालच राहे हक़ पर चल पड़ो, है सफ़र मुश्किल मगर मंज़िल तो पा ली जाएगी। लाख सरवर दर खुले हों इस ज़माने में मगर, दुनियां तेरे दर पर ही बनकर सवाली जाएगी। तालिब जैदी ने भी नजरानए अक़ीदत पेश किया। मजलिस का आगाज़ तिलावते कलामे इलाही से तालिब जैदी ने किया। बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया।

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