कथा व्यास कुलदीप मृदुलांश ने रावण वध की कथा सुनाई।

अवधेश कुमार वर्मा संवाददाता बाराबंकी

मसौली बाराबंकी। ग्राम पंचायत ज्योरी स्थित दुर्गा मंदिर पर चल रही साप्ताहिक श्रीराम कथा में रविवार को कथा व्यास कुलदीप मृदुलांश ने रावण वध की कथा सुनाई।


भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करके जब रावण की नगरी पर आक्रमण किया ,तब एक-एक करके रावण के सभी महान योद्धा, सेनापति, पुत्र, भाई-बंधु मारे गये। अंत में केवल रावण ही बचा था इसलिये वह स्वयं रणभूमि में भगवान श्रीराम से युद्ध करने गया।
उसके बाणों से वानर सेना में चीख पुकार मच गयी। जब बालि पुत्र अंगद को उसने परास्त कर दिया तब श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण उससे युद्ध करने पहुंचे। दोनों के बीच भीषण युद्ध चल ही रहा था कि स्वयं भगवान श्रीराम युद्धभूमि में आ पहुंचे तथा रावण को चुनौती दी।
जब रावण ने युद्धभूमि में विभीषण को श्रीराम की सहायता करते देखा तो अत्यंत क्रोधित हो गया। उसने विभीषण को कटु वचन कहे तथा उसका वध करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली शक्ति अस्त्र का प्रहार किया। विभीषण को बचाने के उद्देश्य से उस शक्ति प्रहार के सामने स्वयं प्रभु श्रीराम आ गए तथा घायल हो गए।तब भगवान ब्रह्मा ने देवराज इंद्र को भगवान राम की सहायता करने के लिए अपना रथ भेजने को कहा। तब देव इंद्र ने अपने सारथी मातली को रथ लेकर भगवान श्रीराम के पास जाने को कहा। मातली देवराज इंद्र की आज्ञा पाकर श्रीराम के पास वह दिव्य रथ लेकर गए लेकिन लक्ष्मण ने इसे शत्रु की चाल समझकर संदेह किया। तब मातली के द्वारा रथ का दिव्य वर्णन करने के पश्चात सभी की शंका मिट गयी। भगवान श्रीराम ने देवराज इंद्र व भगवान ब्रह्मा को धन्यवाद कह वह रथ स्वीकार कर लिया।
तब भगवान ब्रह्मा ने देवराज इंद्र को भगवान राम की सहायता करने के लिए अपना रथ भेजने को कहा। तब देव इंद्र ने अपने सारथी मातली को रथ लेकर भगवान श्रीराम के पास जाने को कहा। मातली देवराज इंद्र की आज्ञा पाकर श्रीराम के पास वह दिव्य रथ लेकर गए लेकिन लक्ष्मण ने इसे शत्रु की चाल समझकर संदेह किया। तब मातली के द्वारा रथ का दिव्य वर्णन करने के पश्चात सभी की शंका मिट गयी। भगवान श्रीराम ने देवराज इंद्र व भगवान ब्रह्मा को धन्यवाद कह वह रथ स्वीकार कर लिया।दोनों के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गयाअंत में भगवान श्रीराम ने अपने तेज बाणों से रावण के सिर काट डाले लेकिन जितनी बार वह रावण का मस्तक काटते तभी एक नया मस्तक प्रकट हो जाता जो रावण की धड़ से जुड़ जाता। यह देखकर प्रभु श्रीराम विचलित हो गए तब विभीषण ने प्रभु श्रीराम को पहले आग्नेय अस्त्र का प्रयोग करके रावण की नाभि का अमृत सुखाने का सुझाव दिया।विभीषण से रावण की मृत्यु का रहस्य पाकर श्रीराम ने आग्नेय अस्त्र का संधान किया तथा उसे रावण की नाभि पर छोड़ दिया। इससे उसकी नाभि का सारा अमृत सूख गया। इसके पश्चात प्रभु श्रीराम से सबसे विध्वंसक अस्त्र ब्रह्मास्त्र का संधान किया तथा उसे रावण पर छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्र के प्रहार से रावण जोर-जोर से जय श्रीराम का चीत्कार करता हुआ भूमि पर रथ सहित गिर पड़ा।

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