कथावाचिका गौरी किशोरी ने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा सुनाई

अवधेश कुमार वर्मा संवाददाता बाराबंकी

मसौली बाराबंकी । विकास खण्ड मसौली की ग्राम गोढवा ग्वारी में स्थित आदि शक्ति दुर्गा माता मन्दिर पर चल रही सात दिवसीय श्रीमतभगवत कथा के पांचवें दिन सीतापुर से पधारी कथावाचिका गौरी किशोरी ने सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कथा सुनाई


कथावाचिका ने जब भी सत्य और दान की चर्चा होती है राजा हरिश्चंद्र का नाम लिया जाना स्वाभाविक है। सच बोलने और दान देने के लिए उनकी मिसाल आज भी दी जाती है। इसलिए भी उन्हें सत्यवादी और दानवीर राजा हरिश्चंद्र कहा जाता है।वो ऐसे दानी थे, जो अगर सपने में भी किसी को दान देते हुए देख ले तो उसे पूरा जरूर करते थे। उन्होंने सत्य के मार्ग पर चलने के लिए अपने राजपाट से लेकर पत्नी तारामती और पुत्र रोहिताश्व का भी त्याग कर दिया।
एक दिन राजा के पुत्र रोहिताश्व को सांप ने डंस लिया, जिससे उसकी मौत हो गई।लेकिन तारामती के पास कफन तक के पैसे नहीं थे। तारामती किसी तरह दुखी मन से पुत्र के शव को गोद में उठाकर शमशान पहुंची।लेकिन श्मशान पहुंचते ही हरिश्चंद्र तारामती से श्मशान का कर मांगने लगे,क्योंकि श्मशाम का कर लेना नियम था और वो अपने मालिक की आज्ञा का पालन कर रहे थे।राजा हरिश्चंद्र पत्नी से बोले कि, श्मशान का कर तो देना ही पड़ेगा।फिर हरिश्चंद्र ने पत्नी से कहा कि यदि तुम्हारे पास कर देने के लिए धन नहीं है तो अपनी साड़ी का कुछ भाग फाड़कर दे दो।उसे ही कर के रूप में रख लूंगा।
लाचार होकर जैसे ही तारामती ने अपनी साड़ी फाड़ना शुरू किया उसी समय तेज गर्जन हुआ और विश्वामित्र प्रकट हो गए।विश्वामित्र बोले- हे राजा! तुम धन्य हो, ये सब तुम्हारी परीक्षा हो रही थी, जिसमें तुमने यह सिद्ध कर दिया कि तुम श्रेष्ठ, दानवीर, सत्यवादी और धार्मिक हो।
इसके बाद पुत्र रोहिताश्व भी जीवित हो उठा और राजा को उसका पूजा राज्य भी लौटा दिया गया।इतना ही नहीं महर्षि विश्वामित्र ने कहा कि, संसार में जब भी धर्म, दान और सत्य की बात की जाएगी, राजा हरिश्चंद्र का नाम आदर-सम्मान के साथ सबसे पहले लिया जाएगा।।इस मौके कथा आयोजन पुजारी रामपाल संतोष सागर देवकी नंदन पवन कुमार पंकज कुमार शेष कुमार अजय मिश्रा रंजीत कुमार ऋषि कुमार वेद प्रकाश आदि मौजूद रहे।

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