सच्चे सन्त के सतसंग से ही तकलीफें जाती हैं अगर कोई सच्चा सन्त और उनका सतसंग मिल जाये तो यही गृहस्थ आश्रम स्वर्ग जैसा बन जाता है
टिंकू विश्वकर्मा संवाददाता तहसील नवाबगंज बाराबंकी
बहराइच (उ.प्र)’बड़े भाग पाइब सतसंगा’ जब भाग्य उदय होता है तब सतसंग के दो वचन सुनने को मिलते हैं। कहा गया-
सतसंग महिमा है अति भारी। जो कोई जीव मिले अधिकारी।।
सन्त उमाकान्त जी महाराज ने सतसंग सुनाते हुए कहा कि आप भी अधिकारी बन रहे हो, आज मुझे भी सुनाने का अवसर मिल रहा है। उस प्रभु की दया जब होती है तभी जीवन में ऐसा अवसर मिलता है। पहले के समय में बराबर सतसंग सुनने की आदत लोग डाले हुए थे और जगह-जगह पर सतसंग के कार्यक्रम होते रहते थे। आज आदत छूट गई। कथा, भागवत, प्रवचन तो जगह-जगह होता है लेकिन उससे तकलीफें नहीं जाती हैं, जीव भवसागर से पार नहीं हो पाता है, यहीं डूबता-उबरता रहता है।
अगर पति पत्नी का फर्ज बताने वाला कोई नहीं मिला तो गृहस्थ आश्रम नरक जैसा बन जाता है
अगर यह समझ में ना आए कि मनुष्य शरीर किस काम के लिए प्रभु ने दिया है तो जैसे पशु-पक्षी खाते-पीते, बच्चा पैदा करके दुनिया संसार से चले जाते हैं वैसे ही मनुष्य की रोते-रोते ही जिंदगी बीत जाती है। अगर सतसंग सुनाने, समझाने वाले सन्त नहीं मिले और उनसे यह नहीं समझा कि भाई-भाई का प्रेम इस तरह से होता है कि जैसे राम के साथ लक्ष्मण जंगल चले गए थे, जबकि आज भाई भाई के खून का प्यासा हो रहा है। राम भगवान को पिता के आदेश का पालन करना पड़ा, लेकिन सीता जी उनके साथ चली गई, 14 वर्ष तक वहां तपस्या ही किया, परेशानी ही झेला। अगर पति-पत्नी का फर्ज बताने वाला कोई नहीं मिला तो गृहस्थ आश्रम नरक जैसा बन जाता है और रोना ही पड़ता है।
जैसे साठ हजार बिच्छू एक साथ डंक मारते हैं, ऐसे मौत के समय दर्द होता है
अगर उपाय नहीं किया तो मौत के आखरी समय बहुत तकलीफ होती है। जिस चीज को आज आप भूल चुके हो, मौत याद नहीं आ रही है ,मौत को याद रखने की जरूरत है। प्रभु याद नहीं आ रहे हैं, बस कमाने खाने, बच्चों की परवरिश, धन रुपया पैसा इकट्ठा करने, जमीन जायदाद को इकट्ठा करने में लगे हुए हो। मौत के समय पीड़ा बहुत होती है। जो शरीर के सुख के लिए शरीर के अंगों से पाप करते रहते हैं उनके लिए कहा है
सहजो मौत के समय, पीड़ा उठे अपार।
बिच्छू साठ हज़ार ज्यों, डंक मारे एक साथ।।
हड्डी-हड्डी चटकती है, आंख की रोशनी खत्म हो जाती है, कान से सुनाई नहीं पड़ता, जुबान तुतली हो जाती है, कोई उस वक्त पर मददगार नहीं होता। कितना भी जवान, पहलवान, धनवान परिवार के लोग हो बचा नहीं सकते हैं। इस शरीर को खाली कराने के लिए यमराज के जो दूत आते हैं, उनको इन बाहरी आंखों से कोई देख नहीं पाता है। मार-मार करके, कूट-कूट करके, झुलसा करके इस जीवात्मा को निकाल करके ले जाते हैं। इंसाफ करने वाले के सामने पेश कर देते हैं, वह इंसाफ करके नर्को में डाल देता है, काटे, सड़ाये, गलाए, तपाए जाते हैं।
*अगर मनुष्य शरीर की कीमत नहीं समझे तो नर्कों, चौरासी में भयंकर पीड़ा झेलनी पड़ेगी
42 प्रकार के नरकों में लाखों करोड़ों वर्ष तक तकलीफ झेलनी पड़ती है। नरकों से छुटकारा मिलने के बाद जीवात्मा कीड़ा-मकोड़ा, पतंगे, मक्खी, मच्छर, जमीन के नीचे रहने वाले कीड़ों के शरीर में, आसमान के उड़ने वाले पक्षियों के शरीर में, जल में रहने वाले जानवरों के शरीर में बंद कर दी जाती है। पेड़-पौधे बनाकर के खड़ा कर दिए गए, 100 साल 50 साल तक खड़े रहो, अपनी इच्छा से कहीं आ जा नहीं सकते हो, यह सजा मिल जाती है, इसी को चौरासी लाख योनी कहते हैं। गाय और बैल की योनि के बाद फिर यह मनुष्य शरीर मिलता है।
टिंकू विश्वकर्मा संवाददाता तहसील नवाबगंज बाराबंकी

