यूएनएससी में ईरान के ख़िलाफ़ पाबंदी बढ़ाने में अमरीका के सामने कड़ी चुनौती, जेसीपीओए के ख़त्म होने का ख़तरा, अमरीका की आर्म्ज़ कंट्रोल असोसिएशन ने पोम्पियो को अंजाम की चेतावनी दी
समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ
संयुक्त राष्ट्र संघ में कूटनैतिक सूत्रों का कहना है कि अमरीका ने सुरक्षा परिषद की ओर से ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों पर लगी पाबंदी की मुद्दत बढ़ाने के लिए उस प्रक्रिया की मदद ली जो परमाणु समझौते जेसीपीओए में मौजूद है, तो उसे यूएनएससी में *कड़ी चुनौती का सामना होगा, क्योंकि अमरीका 2018 में इस समझौते से निकल चुका है।जेसीपीओए नामक परमाणु समझौते पर ईरान और गुट पांच धन एक ने 2015 दस्तख़त किए थे और इस समझौते की यूएनएससी ने प्रस्ताव 2231 के ज़रिए पुष्टि की थी।
अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस समझौते को सबसे बुरा समझौते कह कर इससे अमरीका के निकलने का एलान किया और मई 2018 में ईरान के ख़िलाफ़ फिर से पाबंदी लगा दी। अमरीका दूसरे देशों को भी अपनी तरह क़दम उठाने के लिए दबाव डाल रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव 2231 के मुताबिक़, साल 2006/2007 में ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों पर लगायी गयी पाबंदी अक्तूबर 2020 में ख़त्म हो जाएगी। अमरीका ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों के इक्सपोर्ट और इम्पोर्ट पर लगी पाबंदी के हटने से चिंतित है। वह ख़ुद को जेसीपीओए का सदस्य ज़ाहिर करने की कोशिश कर रहा है, ताकि इस तरह वह ईरान के ख़िलाफ़ फिर से पाबंदी को बढ़ा सके।
मंगलवार को कूटनैतिक सूत्र ने रोयटर्ज़ को बताया कि वॉशिंग्टन ईरान के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सभी पाबंदियों को फिर से लगाने की धमकी को, लिवरेज के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है ताकि यूएनएससी तेहरान के ख़िलाफ़ हथियारों की पाबंदी की मुद्दत को बढ़ा दे।
एक अमरीकी अधिकारी ने नाम ज़ाहिर न होने की शर्त पर कहा कि वॉशिंग्टन ने अपनी रणनीति ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी से साझा की है जो जेसीपीओए के सदस्य हैं।
कूटनयिक सूत्रों का कहना है कि ये योजना संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बाक़ी 11 सदस्यों से साझा नहीं की गयी है जिसमें यूएनएससी के 2 वीटो पावर देश चीन और रूस भी हैं और ये दोनों जेसीपीओए के सदस्य भी हैं। इसलिए यह बात निश्चित लग रही है कि ईरान के ख़िलाफ़ हथियारों की पाबंदी बढ़ाने का चीन और रूस विरोध करेंगे।
रिपोर्ट के मुताबिक़, अगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ईरान के ख़िलाफ़ पाबंदी बढ़ाने से इंकार करता है तो अमरीका ख़ुद के जेसीपीओए का सदस्य होने और ईरान की ओर से इस समझौते का उल्लंघन होने का दावा करके, तथाकथित स्नैपबैक सिस्टम को फिर से लागू करने की कोशिश करेगा।
न्यूयॉर्क टाइम्ज़ ने रविवार को कहा कि विदेश मंत्री माइक पोम्पियो वॉशिंग्टन को जेसीपीओए का सदस्य ज़ाहिर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में वैध तर्क पेश करने का रास्ता समतल कर रहे हैं। यह तेहरान पर हथियारों की पाबंदी की मुद्दत बढ़ाने के लिए यूएनएससी पर दबाव डालने की जटिल रणनीति है।
रोयटर्ज़ ने यूएन के उन कूटनयिक सूत्रों का हवाला दिया जो कह रहे हैं कि वॉशिंग्टन की इस योजना को चुनौती मिलेगी क्योंकि अमरीका जेसीपीओए का सदस्य नहीं है।सुरक्षा परिषद के एक कूटनयिक सूत्र का कहना है कि यह प्लान *पेश होते ही नाकाम हो जाएगा। एक योरोपीय कूटनयिक ने कहाः बहुत मुश्किल है कि आप ख़ुद को उस प्रस्ताव की निगरानी करने वाला पक्ष पेश कर सकें जिससे आप निकल चुके हैं।”
एक दूसरे यूरोपीय अधिकारी ने कहाः “सुरक्षा परिषद की नज़र से यह बहुत ही पेचीदा स्थिति होने वाली है क्योंकि ब्रिटेन, जर्मनी और फ़्रांस जो भी सोच रहे हों, रूस और चीन उसकी क़ानूनी व्याख्या पर दस्तख़त नहीं करेंगे।”
यूएन के प्रस्ताव के साथ अमरीका मनमानी नहीं कर सकता
इस बीच एक पश्चिमी कूटनयिक ने भी नाम ज़ाहिर न होने की शर्त पर एएफ़पी से कहाः आप किसी प्रस्ताव के संबंध में यह मनमानी नहीं कर सकते कि उसके किसी भाग को लागू करें और बाक़ी को छोड़ दें।
इसी तरह अमरीका स्थित हथियारों को नियंत्रण करने वाले संघ आर्म्ज़ कंट्रोल असोसिएशन में अप्रसार नीति की निदेशक केल्सी डेवनपोर्ट का कहना है “अगर पोम्पियो ने अपनी प्लान को लागू किया तो ईरान पर फिर से पाबंदी लगाने से जेसीपीओए ख़त्म हो जाएगा।”
उनके मुताबिक़, अमरीका के इस क़दम से ईरान को एनपीटी से निकलने का मौक़ा मिल जाएगा। केल्सी डेवनपोर्ट ने कहा अमरीका के इस क़दम से उसकी साख को नुक़सान पहुंचेगा जिससे ईरान के साथ भविष्य में बातचीत मुश्किल होगी और इलाक़े में परमाणु संकट का ख़तरा बढ़ जाएगा।
अमरीका ने दुनिया के सामने कशमकश की स्थिति पैदा की
रूस ने भी अमरीका के प्लान की निंदा की है। वियना में रूस के प्रतिनिधि मीख़ाईल उल्यानोफ़ ने ट्वीट किया कि जो देश ईरान समझौते से आधिकारिक रूप से निकल गया हो वह परिभाषा के ज़रिए ख़ुद को उसमें नहीं रख सकता।

