बज़्मे-एवाने- ग़ज़ल के तत्वावधान में भव्य मासिक मुशायरा आयोजित हुआ*

 

*वह तो कुर्सी बचाने में मसरूफ था ओर जलती रही बस्तियां देर तक जकी तारिक़*

 

मसौली बाराबंकी । शायरी अल्फ़ाज़ का वह इस्तेअमाल है जिस में एक तरफ़ मुआनी की वुसअत ज़ह्न को तसख़ीर करे तो दूसरी जानिब नग़मगी की तासीर दिल को जकड़ ले गोया एक अच्छा शेर बशर के पूरे वजूद का तजरिबा होता है ब अल्फ़ाज़े- दीगर मौज़ू अल्फ़ाज़ में हक़ाएक़ की तस्वीर कशी को शायरी कहते हैं, इन ख़्यालात का इज़हार सआदतगंज की अदबी तंज़ीम “बज़्मे- एवाने- ग़ज़ल” के तत्वावधान में आईडियल इंटर कालेज मोहम्मद पुर बाहूं के विशाल हाल में आयोजित होने वाले मासिक तरही मुशायरे के अध्यक्ष बेढब बाराबंकवी के  द्वारा आयोजित हुआ इस अज़ीमुश्शान मुशायरे का संचालन आफ़ताब जामी ने किया और इस में मुख्य अतिथियों के तौर पर सेठ इरशाद अंसारी, हाफ़िज़ इलियास, आसी चौखण्डवी और असर सैदनपुरी उपस्थित हुए मुशायरे की शुरूआत मिस्बाहुर्रमान ने नात पाक से किया। मुशायरे का मजमून था।

“भूक तकती रही रोटियां देर तक”

पर मुशायरा शुरू हुआ मुशायरा में उपस्थित सभी शायरों ने अपने अपने अंदाज में शेर पढ़ कर मुशायरे में जिंदा दिली पैदा कर दी बहुत ज़ियादा पसन्द किए जाने वाले अशआर का इंतिख़ाब पेश है।

बोझ बस्ते का जो ढो नहीं पाए वो

ढोते हैं आलू की बोरियाँ देर तक

बेढब बाराबंकवी

उस के जिस्मे- मुअत्तर को छू क्या लिया

ख़ुशबू देती रहीं उंगलियाँ देर तक

ज़की तारिक़ बाराबंकवी

हो न ईमाँ तो ज़मज़म निकलता नहीं

लाख रगड़े कोई एड़ियाँ देर तक

ज़मीर फ़ैज़ी रामनगरी

उस ज़बाँ में उतर आए ख़ुशबू तेरी

ज़िक्र तेरा करे जो ज़बाँ देर तक

असर सैदनपुरी

दूर मंज़िल है उजलत से मत काम लो

हौसला अपना रख्खो जवाँ देर तक

कलीम तारिक़

इक न इक दिन मिले गी उन्हें भी सज़ा

बच न पाएँगे ईज़ारसाँ देर तक

राशिद ज़हूर

जब भी मौक़ा मिला तोड़ दूँगा क़फ़स

क़ैद में कब रहीं आँधियाँ देर तक

ज़हीर रामपुरी

एक तितली का कुछ भी नहीं कर सकीं

ज़ोर करती रहीं आँधियाँ देर तक

अली बाराबंकवी

झील सी उन की आँखों की गहराई में

मैं लगाता रहा डुबकियाँ देर तक

अनवर सैलानी

मेरे ओर उन के उफ़ दरमियाँ देर तक

वस्ल में भी रहीं दूरियाँ देर तक

मुश्ताक बज़्मी

सर से पा तक वो इक नूर ही नूर है

देख पाओगे जलवे कहाँ देर तक

असलम सैदनपुरी

आज अपनी भी होती कोई दास्तां

साथ रहते जो हम जाने- जाँ देर तक

नाज़िश बाराबंकवी

हर तरफ़ ज़ुल्म की इंतिहा देख कर

गिर्या करता रहा आसमाँ देर तक

मिस्बाह रहमानी

ढूंढ पाया न मेरा निशाँ देर तक

रंग बदला किया आसमाँ देर तक

शफ़ीक़ रामपुरी

इश्क़ का भूत उस का न उतरा मगर

सर पे पड़ती रहीं जूतियाँ देर तक

चटक चौखण्डवी

माँ ने सजदे में सर अपना ख़म कर दिया

मैं सफ़र में रहा हूँ जहाँ देर तक

अरशद उमैर

जब कभी भी हिमायत की मज़लूम की

मुझ को मिलती रहीं धमकियाँ देर तक

सग़ीर क़ासिमी

हम बनाते रहे आशियाँ देर तक

वो गिराते रहे बिजलियाँ देर तक  सहर अय्यूबी

इन शोअरा के अलावा आसी चौखण्डवी, उबैद अज़मी, मक़सूद प्यामी, शमशाद रायपुरी, राशिद चौखण्डवी, दिलकश चौखण्डवी, आफ़ताब जामी, शफ़क़ ज़र्रार रामपुरी, क़मर सिकन्दरपुरी, तालिब नूर, नईम सिकन्दरपुरी आदि ने भी अपना अपना तरही कलाम पेश किया, श्रोताओं में मास्टर मोहम्मद वसीम, मास्टर मोहम्मद क़सीम, मास्टर मोहम्मद हलीम, मास्टर मोहम्मद राशिद अंसारी और मोहम्मद नदीम अंसारी साहिबान के नाम भी क़ाबिले- ज़िक्र हैं, “बज़्मे- एवाने- ग़ज़ल” का आइंदा तरही मुशायरा 31/ दिसम्बर बरोज़ रविवार निम्नलिखित मिसरे पर होगा

“तेरे सिवा किसी की मुझे आरज़ू न हो”

क़ाफ़िया:- आरज़ू

रदीफ़:- न हो।

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