जब एक मुख्य टिकट निरीक्षक विदा हुआ, तो आँखें नम और स्मृतियाँ जीवित हो उठीं

शमीम अंसारी बाराबंकी

राज कुमार श्रीवास्तव मुख टिकट निरीक्षक बाराबंकी की सेवानिवृत्ति, सेवा, त्याग और संस्कारों का भावभीना अध्याय सम्पन्न

बाराबंकी।कुछ विदाइयाँ केवल कुर्सी छोड़ने की नहीं होतीं, वे वर्षों के त्याग, अनकहे संघर्ष और निस्वार्थ सेवा से भरे जीवन का मौन सम्मान होती हैं। ऐसा ही एक अत्यंत भावुक क्षण तब साक्षी बना, जब बाराबंकी रेलवे स्टेशन पर रहे राज कुमार श्रीवास्तव
मुख टिकट निरीक्षक के सेवानिवृत्त होने पर रेलवे स्टेशन पुराने बंगले पर एक भावविभोर, गरिमामय और आत्मा को छू लेने वाला विदाई समारोह आयोजित किया गया।

उत्तर प्रदेश के विभिन्न रेलवे स्टेशन से पधारें रेलवे कर्मचारियों और समाजसेवियों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज कुमार श्रीवास्तव जी केवल एक कर्मचारी नहीं नहीं, बल्कि रेलवे कर्मचारियों-परिवार की आत्मा थे। पूरे वातावरण में सन्नाटा भी था और स्मृतियों की गूंज भी—हर चेहरा कुछ कहता, पर शब्द साथ नहीं दे पा रहे थे।

कार्यक्रम में बोलते हुए राज कुमार श्रीवास्तव का स्वर भी भावनाओं से भीग उठा। उन्होंने कहा- _“ रेल्वे ने कभी अपने कर्तव्य को बोझ नहीं माना। सीमित संसाधन, कठिन परिस्थितियाँ और अनेक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने यात्रियों के भविष्य यात्रा को मंगल में बनाने के लिए को अपनी प्राथमिकता बनाया।

बाराबंकी स्टेशन मास्टर राय ज्यादा ने कहा
राज कुमार श्रीवास्तव उस दीये की तरह होते हैं, जो खुद जलकर दूसरों का अंधकार मिटा देते हैं। उनकी सरल मुस्कान, स्नेहभरी डांट और रेलवे के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों को दिशा देता रहेगा। आज एक अध्याय पूरा हुआ है, पर उनकी कहानी कभी समाप्त नहीं होगी।”

समारोह के अंतिम क्षण सबसे अधिक भावुक रहे। जब विदाई की बेला आई तो कई आँखें नम थीं, शब्द रुंध गए थे और तालियाँ भी मौन पीड़ा को छिपा नहीं पा रही थीं। उसी क्षण यह संकल्प भी लिया गया कि सेवानिवृत्ति के बाद भी राज कुमार श्रीवास्तव जी का अनुभव, स्नेह और मार्गदर्शन रेलवे-जगत का पाथेय बना रहेगा।

यह विदाई समारोह यह याद दिलाने के लिए पर्याप्त था कि कर्मचारी कभी रिटायर नहीं होता। वह स्मृतियों, संस्कारों और साथियों के भविष्य में सदैव जीवित रहता है। इस मौके पर मुक्त टिकट निरीक्षक श्री लुकमान आशीष मुस्तफा शमीम अंसारी सहित दर्जनों लोग उपस्थित रहे

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