सब्र इंसानियत और इत्तेहाद के मरक़ज़ को करबला कहते हैं : मौलाना हसनैन
मामुन अंसारी जिला ब्यूरो बाराबंकी(एस0एम0 न्यूज 24 टाइम्स)9044641489
बाराबंकी। करबला वालों के ग़म का एहसास ही हमारे सब्र का ज़रीया है।करबला वालों के ग़म याद कर हम अपने ग़म भूल जाते हैं। करबला वालों के अलावा इतने इम्तेहान के बाद किसी के बस का नहीं जो रज़ा ए इलाही पर साबित क़दम रह सके।यह बात इमाबाड़ा मीर मासूम अली कटरा में मजलिसे सय्युम बरा ए ईसाल ए सवाब मलिका ज़हरा बिन्ते सै. अख़लाक़ हुसैन को खि़ताब करते हुए आली जनाब मौलाना सै. मो. हसनैन बाक़री ने कही। मौलाना ने यह भी कहा कि सब्र इंसानियत और इत्तेहाद के मरक़ज़ को करबला कहते हैं। करबला रस्मों रिवाज़ नहीं कोई त्योहार नहीं ज़िन्दगी के तरीक़े व सलीके़ की दर्सगाह है। जो लोग अहले बैत की चौखट पर सर झुकाते हैं बादे इम्तेहान उनके दर्जे बलन्द हो जाते हैं। ख़ुदा के फ़ैसले पर हर हाल में राज़ी रहने वाले ही नेक व सालेह बन्दे होते हैं। आखिर में करबला वालों के मसायब पेश किए जिसे सुनकर सभी रो पड़े। मजलिस से पहले डा० रज़ा मौरानवी, कशिश संडीलवी, अजमल किन्तूरी, बाक़र नक़वी व अयान ने नज़रानये अक़ीदत पेश किया। मो. इसहाक (अली मियां) ने मजलिस का आग़ाज़ तिलावते कलामे इलाही से किया। बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया।
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