शहीद का तसकिरा जिन्दा कौमें करती हैं ‘‘इस्लाम अली व फातिमा के सिवा कुछ भी नहीं ‘‘शहीद का तसकिरा जिन्दा कौमें करती हैं

सगीर अमान उल्लाह जिला ब्यूरो बाराबंकी

बाराबंकी। शहीद मशअला ए राह होता है जिसका ईंधन भी खुदा देता है इंसानों को अपने उजाले के जरिये रास्ता दिखाता है। इस्लाम अली व फातिमा के सिवा कुछ भी नहीं ‘‘रोजा,नमाज,हज व जकात वगैरह तो दीन की कलियां, पत्तियां ,टहनियां, तने वगैरह हैं। यह बात हुज्जतुल इस्लाम आली जनाब मौलाना मोहम्मद मियां आब्दी ‘‘ कुम्मी ‘‘ ने मौलाना गुलाम अस्करी हाल में मरहूमा शाहीन फातिमा बिन्ते सै.मो.बाकर की मजलिस ए चेहल्लुम को खिताब करते हुए कही। उन्होंने यह भी कहा कि शहीद का तसकिरा जिन्दा कौमें करती हैं । तमाम कुरबानियों के बाद बड़ी मुश्किल से दीन ए इस्लाम हम तक पहुंचा है।मोहर्रम जो आज पूरी दुनियां में नजर आ रहा है। इसको आम लोगों तक पहुंचने में 300 साल लग गये ।बातिल को बे नकाब करने के लिये खुले मैदान में लाने में खानदान ए बनी हाशिम का सबसे बड़ा किरदार रहा है।सर जमीन ए यमन मे बगैर तलवार चलाए सिर्फ अली को देखकर लोग ईमान लाए इस्लाम को फतह हासिल हुई।लोगों ने अली को देखा और इस्लाम को पहचाना।अब जरूरत है फातमियां को आम किया जाय ताकि लोग जान सकें 75 व 90 दिन में जनाब ए फातिमा स.के साथ वो कौन सा जुल्म हुआ जिसका नतीजा सन 61 हिजरी में  करबला सामने आई।आखिर में जनाब ए फातिमा स.के मसायब बयान किये जिसे सुनकर मोमनीन रो पड़े । मजलिस से पहले डा. रजा मौरान्वी ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा -बदन से रूह का रिश्ता भी अक्सर  टूट जाता है , खत ए शमशीर ए अब्बास ए दिलावर पार करने में । कशिश संडीलवी ने पढ़ा – उसके सामने तलवार भला क्या चलती , जिसनें बैयत को दबे पांव भी चलने न दिया ।अजमल किन्तूरी ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा -यूं अबू तालिब ने की है मुस्तुफा की परवरिश,जैसे सूरज पर किसी ने आके साया कर दिया। सरवर अली करबलाई ने अपना कलाम पेश करते हुए पढ़ा- छोड़ कर दुनियां की लालच राहे हक पर चल पड़ो,है सफर मुश्किल मगर  मंजिल तो पा ली जाएगी । इसके अलावा जाकिर इमाम, जईम काजमी, मो.सादिक, मोहसिन इमाम व अरबाब ने भी नजरानये अकीदत पेश किया।मजलिस का आगाज तिलावते कलाम ए पाक से सैफ हैदर हुसैनी ने किया। बानिये मजलिस ने सभी का शुक्रिया अदा किया।
सगीर अमान उल्लाह जिला ब्यूरो बाराबंकी

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