तेल की डिमांड में कमी गंभीर वित्तीय संकट पैदा कर देगी, बहुत बड़ी ग़लती कर बैठे बिन सलमान

समाचार एजेंसी न्यूज़ एसएम न्यूज़ के साथ

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान ने रूस से सहमति न बन पाने के बाद मार्केट में तेल की भरमार कर देने का फ़ैसला करके बड़ी ख़तरनाक ग़लती कर दी। उनकी इस ग़लती का नतीजा यह है कि तेल के बाज़ार में संकट आने के साथ ही शेयर बाज़ारों का भी बुरा हाल हो गया।
कैम्ब्रिज युनिवर्सिटी में पोलिटिकल इकानोमी की शिक्षक हेलन थामसन ने गार्डियन अख़बार में छपने वाले अपने लेख में लिखा कि जब अमरीकी तेल की क़ीमत ज़ीरो से 38 डालर नीचे पहुंच गई तो उस वक़्त पता चला कि कोरोना वायरस का संकट अब बहुत लंबा खिंचेगा। तेल ख़रीदने वाले कुछ लोग एसे होते हैं जो तेल इसलिए ख़रीदते हैं कि उसे तत्काल बेच सकें उनके पास तेल को रखने के भंडार नहीं होते वही मजबूर हुए कि ख़रीदार को तेल देने के साथ ही पैसे भी अदा करें।
कोई भी यह नहीं सोच रहा था कि तेल की डिमांड बहुत लंबे समय के लिए घट जाएगी। इस समय जून के लिए जो वायदा तेल सौदा हुआ है वह 20 डालर प्रति बैरल के रेट से हुआ है लेकिन यह क़ीमत भी बहुत ख़तरनाक है।पहले बाज़ारों में तेल की कमी रहा करती थी जिसके भरने के लिए अमरीका ने शेल आयल का उत्पादन बढ़ा दिया और जब 2014 आया तो बाज़ार में शेल आयल के आ जाने से सप्लाई इतनी बढ़ गई कि बाज़ार में तेल की कोई कमी नहीं रही। इस बीच तेल उत्पादक देशों ने अधिक तेल बेचने की कोशिश शुरू कर दी और सब घातक प्रतिस्पर्धा में कूद पड़े। जब क़ीमतें संकटमय हद तक गिर गईं तब तेल उत्पादक देशों को कुछ होश आया कि उत्पादन में कटौती करना ज़रूरी हो गया है। नवम्बर 2016 में रूस और सऊदी अरब ने इन्हीं हालात को देखते हुए एलायंस बनाया जिसे ओपेक प्लस कहा जाता है। ओपेक प्लस ने उत्पादन में कटौती की तो अमरीका की शेल आयल कंपनियों ने पूरी आज़ादी से अपने तेल की क़ीमत बढ़ाई।
इस बीच अमरीका ने रूस की नार्द स्ट्रीम कंपनी पर प्रतिबंध लगा दिया जिसके ज़रिए रूस जर्मनी को गैस का निर्यात बढ़ाना चाहता था तो रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतीन इस सोच में पड़ गए कि रूस के तेल प्रोडक्शन ककटौती का फ़ायदा अमरीकी शेल आयल कंपनियां क्यों उठाएं?उधर कोरोना वायरस की महामारी फैल गई और विश्व अर्थ व्यवस्था बंद हो गई ओपेक प्लस को ख़याल आया कि तेल का उत्पादन कम करना ज़रूरी हो गया। रूस ने सारे हालात को देखते हुए यह फ़ैसला किया कि रूस तेल के उत्पादन में अब और कटौती नहीं करेगा। दूसरी ओर सऊदी अरब ने यह फ़ैसला कर डाला कि जब रूस कटौती नहीं कर रहा है तो वह बाज़ार को तेल से भर देगा।
चूंकि तेल की डिमांड भी कम होती जा रही थी इसलिए बिन सलमान के फ़ैसले ने संकट को कई गुना बड़ा कर दिया, साथ ही शेयर बाज़ार भी ध्वस्त हो गए। अब हालत यह है कि 2022 के लिए भी तेल सौदे 30 डालर प्रति बैरल से ऊपर नहीं जा पाएंगे। अब तेल की क़ीमतें इतनी नीची रहेंगी तो वह क़र्जे नहीं अदा हो जाएंगे जो तेल से मिलने वाली आमदनी के ज़रिए अदा किए जाने थे। इस तरह एक नया संकट जन्म लेगा।
मैक्सिको की सरकारी तेल कंपनी इस समय क़र्ज़ के गंभीर संकट से जूझ रही है। मूडीज़ ने भी अनुमान लगाया है कि कंपनी का यह संकट अब और बढ़ जाएगा।
बहुत से देशों में बहुत सारे उद्योग तेल उद्योग से जुड़े हुए हैं। अब अगर तेल उद्योग इसी तरह संकट में फंसा रहा तो बहुत सारे सेक्टर ध्वस्त हो जाएंगे। हो सकता है कि कई साल तक तेल की क़ीमत 100 डालर प्रति बैरल तक न पहुंचे लेकिन यह भी तय है कि लाक डाउन से पहुंचने वाले भारी नुक़सान से अर्थ व्यवस्थाओं को उबरना है तो ऊंचे दाम पर तेल की बिक्री ज़रूरी है।

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