श्रीमद्भागवत कथा के अन्तिम दिन पूजा अर्चना हवन पूर्ण आहुति के भण्डारे के साथ समापन किया गया गया ।
अवधेश कुमार वर्मा संवाददाता बाराबंकी
मसौली बाराबंकी । विकास खण्ड मसौली की ग्राम सैदाबाद में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के अन्तिम दिन पूजा अर्चना हवन पूर्ण आहुति के भण्डारे के साथ समापन किया गया गया । तथा आये हुए कथावाचक की पूरी टीम आयोजक पंकज कुमार रावत सुनील विश्वकर्मा श्रवण कुमार वर्मा हरिओम रावत प्रमोद कुमार अंकित आदि ने अंग वस्त्र दाक्षिणा प्रसाद देकर सम्मानित किया।

ग्राम सैदाबाद में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथा वाचक पं हेमराज महाराज जी ने साबरी की भक्ति के कथा सुनाई । कथा सुनने मानवों जीवन में अन्धकार दूर होता है ।ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा बुराईयों का नाश होता है ।मानव जीवन का कल्याण होता है ।
कथावाचक पं हेमराज महाराज ने कहा माता शबरी भगवान श्री राम की परम भक्त थी। शबरी का असली नाम “श्रमणा” था। ये भील सामुदाय के शबर जाति से संबंध रखती थीं इसी कारण कालांतर में उनका नाम शबरी हुआ। इनके पिता भीलों के मुखिया थे, उन्होंने श्रमणा का विवाह एक भील कुमार से तय किया था। विवाह से पहले परंपरा के अनुसार कई सौ पशुओं को बलि देने के लिए लाया गया। जिन्हें देख श्रमणा का हृदय द्रवित हो उठा कि यह कैसी परंपरा जिसके कारण बेजुबान और निर्दोष जानवरो की हत्या की जाती है। इसी कारणवश शबरी अपने विवाह से एक दिन पूर्व दिवस पूर्व भाग गई और दंडकारण्य वन में पहुंच गई।
दंडकारण्य में मातंग ऋषि तपस्या किया करते थे। श्रमणा उनकी सेवा करना चाहती थी परंतु वह भील जाति से थी जिसके कारण उन्हें लगता था कि उन्हें सेवा करना का अवसर नहीं मिलेगा, लेकिन इसके बाद भी वे चुपचाप प्रातः जल्दी उठकर आश्रम से नदी तक का रास्ते से सारे कंकड़ और कांटो को चुनकर पूरे रास्ते को भलिभांति साफ कर दिया करती थी और रास्ते में बालू बिछा देती थी।
एक दिन जब शबरी यह सब कार्य कर रही थी तो ऋषिश्रेष्ठ ने उन्हें देख लिया। वे शबरी की सेवा भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने आश्रम में शरण दे दी। शबरी वहीं पर रहने लगी। एक दिन जब ऋषि मातंग को लगा कि उनका अंत समय निकट है तो उन्होंने शबरी से कहा कि वे अपने आश्रम में ही प्रभु श्री राम की प्रतीक्षा करें। , आयोजक पंकज कुमार रावत सुनील विश्वकर्मा श्रवण कुमार वर्मा हरिओम रावत प्रमोद कुमार आदि मौजूद रहे ।

